अलास्का शिखर बैठक के बाद क्या?

/alaaska-shikhar-baithak-ke-baad-kya

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच अलास्का में बैठक हुई। बैठक के पहले अमरीकी राष्ट्रपति पत्रकारों से बात करते हुए रूसी राष्ट्रपति को चेतावनी और धमकी दे रहे थे कि अगर युद्ध विराम नहीं हुआ तो यह रूस के लिए बहुत खराब होगा। इसके पहले भी ट्रम्प पचास दिनों के अंदर रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध विराम की समय सीमा निर्धारित कर चुके थे। इसे फिर एक सप्ताह के लिए बढ़ा दिया था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ट्रम्प ने गर्मजोशी से पुतिन का स्वागत किया। युद्ध विराम नहीं हुआ। ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बुनियादी कारणों को हल करने सम्बन्धी रूस की बात को स्वीकार कर लिया। रूस द्वारा कब्जा किये गये चार प्रांतों और क्रीमिया को रूस को देना स्वीकार करने के लिए जेलेन्स्की को सलाह दी। यूक्रेन नाटो का सदस्य नहीं बनेगा, इसे भी ट्रम्प ने स्वीकार कर लिया। यूक्रेन की सुरक्षा की गारण्टी की बात को ट्रम्प ने यूरोपीय देशों के ऊपर छोड़ दिया। 
    
ट्रम्प और पुतिन के बीच शीर्ष बैठक को लेकर जेलेन्स्की, यूरोपीय संघ और नाटो देशों के बीच खलबली मच गयी। इस वार्ता में न तो जेलेन्स्की को बुलाया गया और न ही यूरोप के नाटो देशों को। 
    
इसके बाद ट्रम्प ने जेलेन्स्की और यूरोपीय संघ के नेताओं को राष्ट्रपति भवन में बुलाकर कहा कि यह युद्ध समाप्त होना चाहिए। जेलेन्स्की को रूस द्वारा जीती गयी जमीन को उसे सौंप देना चाहिए। जेलेन्स्की और यूरोपीय संघ के देश ट्रम्प को युद्ध विराम के लिए रूस पर दबाव डालने की कोशिश करने पर जोर दे रहे थे, जबकि ट्रम्प स्थायी शांति के लिए चर्चा कर रहे थे। ट्रम्प को मनाने में यूरोपीय संघ के नेता असफल रहे। वे ट्रम्प से यूक्रेन को हथियार देने और युद्ध में अमरीका के लगे रहने की प्रार्थना कर रहे थे। जबकि ट्रम्प ने उन्हें स्पष्ट कर दिया कि अमरीका यूक्रेन के युद्ध को जारी रखने में भागीदारी नहीं करेगा। जहां तक यूक्रेन को हथियार देने की बात है, ट्रम्प ने स्पष्ट तौर पर कहा कि यूरोपीय देश अमरीका से हथियार खरीद कर यूक्रेन को दे सकते हैं। 
    
यूरोपीय संघ और नाटो के देश यूक्रेन को युद्ध जारी रखने में पूरी मदद करने की बात करते रहे। लेकिन वे इसे अच्छी तरह जानते हैं कि बगैर अमरीकी सैन्य सहायता के वे रूस का मुकाबला नहीं कर सकते। इस वजह से भी उनके बीच यूक्रेन की मदद करने के सम्बन्ध में मतभेद तेज होते जा रहे हैं। वे अमरीकी हथियारों और सेना के बल पर यूक्रेन की मदद करना चाहते हैं। जबकि ट्रम्प अपने को शांति स्थापित करने वाले के रूप में पेश करने का दावा कर रहे हैं। 
    
यूरोप के देशों के शासक अमरीकी राष्ट्रपति से इस बात की भी शिकायत करते हैं कि ट्रम्प ने ‘‘हत्यारे’’ पुतिन, ‘‘राक्षस’’ पुतिन को सम्मान देकर रूस के अलगाव को खतम करने में मदद की है। यूरोपीय शासकों की दृष्टि में रूस यूक्रेन पर हमला करने के बाद दुनिया भर में अलग-थलग पड़ गया था। लेकिन ट्रम्प द्वारा लाल कालीन बिछाकर उसका गर्मजोशी से स्वागत करने से पुतिन अलग-थलग स्थिति से उबर कर दुनिया की राजनीति के केन्द्र में आ गया है। ट्रम्प ने पुतिन को वैधता प्रदान की है। 
    
ट्रम्प न तो शांतिदूत है और न ही उसे आक्रामक युद्धों से कोई परहेज है। वह अमरीकी साम्राज्यवाद के गिरते विश्वव्यापी प्रभाव को रोकने की कोशिश में लगा है। वह न तो अपने रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी करने से गुरेज कर रहा है और न ही दुनिया के पैमाने पर तैनात अपने फौजी अड्डों को कम कर रहा है। वह गाजा में नरसंहार करने में इजरायली यहूदी नस्लवादी शासकों की मदद कर रहा है। वह गाजा से फिलिस्तीनियों को उजाड़कर, आबादी का सफाया करने में इजरायली शासकों से मिलीभगत किये हुए है। इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत भूख और पानी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। 
    
ट्रम्प अमरीकी साम्राज्यवादियों के विश्व प्रभुत्व को बचाये रखने के लिए रूसी साम्राज्यवादियों के साथ अपने सम्बन्ध सुधारना चाहता है। ट्रम्प जानता है कि यूरोपीय संघ और नाटो के देश उसके फौजी खर्च के बल पर अपने-अपने देशों में समृद्ध हुए हैं। इसलिए वह सभी नाटो देशों को अपने सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत रक्षा बजट में खर्च करने की मांग कर रहा है। यह यूरोपीय शासक अपने बहुत सारे सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों की कीमत पर ही कर सकते हैं। वे पहले से ही कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कटौती कर चुके हैं। 
    
ट्रम्प की यह भी कोशिश है कि वह रूसी साम्राज्यवादियों के साथ नजदीकी बनाकर रूसियों और चीनी साम्राज्यवादियों के बीच दरार खड़ी करे। लेकिन उसने तटकर युद्ध छेड़कर अपने मित्रों और विरोधियों दोनों को अपने से दूर किया है। इसके पहले रूस, चीन और ईरान सहित अन्य देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर इन देशों को आपस में और ज्यादा एकजुट होने में मदद की है। 
    
ट्रम्प का रूस के साथ सम्बन्ध को सामान्य बनाने का एक बड़ा मकसद रूस के प्राकृतिक संसाधानों, विशेष तौर पर उसके पास मौजूद दुर्लभ मृदा तत्वों के भण्डार पर सौदा करना है। वह इस संदर्भ में यूक्रेन से पहले ही सौदा कर चुका है। 
    
यूरोपीय साम्राज्यवादियों ने भी यूक्रेन के प्राकृतिक साधन स्रोतों पर कब्जा करने की योजनायें बना रखी हैं। कुछ ने तो जेलेन्स्की से 99 वर्ष के लिए इन संसाधनों के निष्कर्षण के लिए जमीन पट्टे पर ले ली है। यूरोपीय शासक इसीलिए बौखलाये हुए हैं क्योंकि ट्रम्प-पुतिन शीर्ष वार्ता के बाद उनके इस इरादे पर यानी यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों के कब्जे पर पलीता लग सकता है। 
    
जहां तक रूसी साम्राज्यवादियों का ताल्लुक है वे यूक्रेन को लगातार पीछे धकेल रहे हैं। वे नये-नये इलाकां पर कब्जा करते जा रहे हैं। यूक्रेनी सेना में नयी भर्ती के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। वह मोर्चे पर पराजित हो रही है। जेलेन्स्की की सत्ता को गिराने वाली शक्तियां यूक्रेन में सक्रिय हैं। अगर जेलेन्स्की ट्रम्प की शर्तों को, रूस के साथ युद्ध समाप्त करने की शर्तों को स्वीकार नहीं करते तो ट्रम्प शासन भी जेलेन्स्की का तख्तापलट करा सकता है। अमरीकी साम्राज्यवादियों का तख्तापलट कराने का लम्बा इतिहास है। 
    
अलास्का शिखर बैठक के बाद के घटनाक्रम यह बताते हैं कि पुतिन इसमें विजयी होकर उभरे हैं। यूरोपीय संघ और नाटो के देश ज्यादा परेशानी में पड़े हैं और जेलेन्स्की की हुकूमत खतरे में पड़ी है। अमरीकी साम्राज्यवादियों के अगर रूस के साथ सम्बन्ध सामान्य होने की ओर बढ़ते हैं तो अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को रूस में निवेश करने का अवसर मिलेगा। 
    
लेकिन इससे अमरीका के विश्वव्यापी प्रभाव में गिरावट की प्रक्रिया को रोकने में कोई मदद मिलेगी, इसमें संदेह है।  

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।