दानव को संत दिखाने की कोशिश

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राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस दानव को संत का जामा पहनाने की कोशिश की गयी। ‘‘संघ की यात्रा के 100 वर्ष - नए क्षितिज’’ नामक तीन दिवसीय कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की कट्टर हिन्दुत्व की छवि के ऊपर संत का मुलम्मा चढ़ाने का पूरा प्रयास किया। उन्होंने दिखाने की कोशिश की कि संघ सभी धर्मों-जातियों का हितैषी है। पर जैसा होता है मेमने की खाल ओढ़ने से भेड़िया संत नहीं हो जाता। वही बात संघ पर भी लागू होती है। इसके हिंसक दांत लाख छुपाने पर भी बाहर आने से नहीं बचे। 
    
सब जानते हैं कि संघ सवर्ण ब्राह्मणवादी सोच से ग्रस्त संगठन है। यह जाति व्यवस्था का न केवल समर्थक है बल्कि मनु स्मृति का पुजारी भी है। ऐसे में संघ प्रमुख जब आरक्षण का समर्थन करते हुए यह कहते हैं कि ‘जाति व्यवस्था कभी अस्तित्व में थी, लेकिन आज इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है’। तो वे साफ झूठ बोल रहे होते हैं। अगर संघ जाति विरोधी ही है तो क्यों मनु स्मृति की वकालत करता है। क्यों उसके संगठनों के लम्पट कार्यकर्ता दलितों पर हमला बोल रहे होते हैं। स्पष्ट है संघ न केवल घोर जातिवादी है बल्कि जाति के खात्मे की राह की बड़ी बाधाओं में से एक है। संघ प्रमुख बस कुछ पढ़े-लिखे लोगों को बरगलाने व सबको हिन्दू धर्म के नाम पर एकजुट करने के लिए यह पाखण्ड रच रहे थे। अन्यथा तो उन्हें मनु स्मृति के साथ संघ के पूर्व गुरूओं का खण्डन व लानत मलामत करनी चाहिए थी। 
    
कुछ ऐसी ही बातें उन्होंने मथुरा-काशी के लिए उनके ही संगठनों द्वारा चलाये जा रहे उत्पाती अभियान के बारे में भी कहीं। उन्होंने इन अभियानों को संघ द्वारा समर्थन न देने की बात कही। यह बात भी झूठ के सिवा कुछ नहीं है। जमीनी स्तर पर संभल-मथुरा- काशी से लेकर अनगिनत मस्जिदों पर संघी कार्यकर्ता हमलावर हैं, उन्हें मंदिर साबित करने में तुले हैं और इसके लिए साम्प्रदायिक टकराव का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं और उनका सरगना कह रहा है कि इस सबमें उसके संगठन का कोई हाथ या समर्थन नहीं है। यह तो वैसी ही बात है जैसे भेड़ियों का सरदार बाकी जानवरों को बताये कि भेड़िया शाकाहारी जानवर है। 
    
धर्म के मसले पर भागवत ने इसे व्यक्तिगत पसंद का मसला बताते हुए इसे लोगों पर थोपने का विरोध किया। पर खुद संघ-भाजपा का अब तक का इतिहास यही दिखाता है कि संघ ने आज तक हिंदू धर्म के प्रतीकों-खान-पान-संस्कृति को जबरन लोगों पर थोपने का ही अभियान चलाया है। चाहे मामला पहनावे का हो, भाषा का हो, गौमांस का हो या फिर जीवन शैली का हो, संघ-भाजपा सबको ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की परम्पराओं में ढकेलना चाहते हैं।
    
संघ प्रमुख ने लोगों को तीन बच्चे पैदा करने का उपदेश दिया। टैरिफ पर मोदी सरकार का समर्थन किया। उन्होंने 75 साल में सेवानिवृत्ति की खुद की पुरानी बात से पलटी खायी और कहा कि उन्होंने कभी इसकी वकालत नहीं की। बताया कि संघ हिंसा में विश्वास करता तो भूमिगत संगठन होता। हालांकि वे यह नहीं बता पाये कि अगर संघ अहिंसक ही है तो दशहरे पर हथियारों की पूजा क्यों करता है। क्यों शाखाओं में लाठी व अन्य शस्त्र संचालन की ट्रेनिंग मिलती है। क्यों दंगों से लेकर आतंकी घटनाओं में संघ की लिप्तता के आरोप लगते रहे हैं। 
    
संघ प्रमुख के मुख से जहर इस बार घुसपैठियों के नाम पर निकला। जिन्हें देश से निकाले जाने, रोजगार न देने की उन्होंने वकालत की। संघ प्रमुख ने आक्रांताओं के नाम पर सड़क व अन्य इमारतों के नाम न रखने की वकालत की। पर यह नहीं बताया कि आक्रांता कौन है और कौन नहीं यह तय कैसे होगा। 
    
कुल मिलाकर संघ का यह 3 दिवसीय कार्यक्रम संघ को संत का जामा पहनाने की कोशिश रहा। सरसंघचालक इस कार्यक्रम में केन्द्र में रहे। दानवों का सरगना संत की वेशभूषा में खुद को संत दिखाने में जुटा रहा। पर इससे दानव के कारनामे (अतीत व भविष्य दोनों के) नहीं बदलने वाले। हां टी वी चैनलों पर उसके मीठे बोल से कुछ लोग भ्रमित जरूर हो सकते हैं। मीठे बोलों के पीछे दानवों के सरदार का यही उद्देश्य भी था। 
    
संघ पैदायश से लेकर आज तक 100 वर्षों से भारतीय समाज में जहर घोलने वाली सबसे संगठित शक्ति रही है। आजादी से पूर्व यह आजादी के संघर्ष के विरोध में खड़ा था। हिन्दू-मुस्लिम दंगों में भागीदारी कर आजादी के साझे संघर्ष को कमजोर करने में जुटा था। आजादी के बाद भी जहां-जहां देश में दंगे हुए वहां संघ की कोई न कोई नकारात्मक भूमिका जरूर रही। कई बार इसने समाज को ऐसे कत्लेआमों की ओर ढकेला जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। 
    
हिटलर-मुसोलिनी का पुजारी यह संगठन अपने इतिहास और शरीर से चाहे जितने बदनुमा दाग हटा ले, उसकी हर नयी करतूत इसके मत्थे नये बदनुमा दाग हर रोज लगाती रहती है। ऐसे में बड़ी पूंजी के सहयोग-समर्थन से फासीवादी हिन्दू राष्ट्र कायम करने की ओर बढ़ रहे इस दानव और इसके चेले राक्षसों के प्रति कोई गलतफहमी नहीं पाली जा सकती। 
    
आज आम भारतीय जनमानस के जीवन के दुख-कष्ट इस दानव से मुक्ति के बगैर खत्म नहीं हो सकते।  

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