यूरोप में उठती छात्र-युवा आंदोलन की लहर

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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इस वक्त पूरा यूरोप जनाक्रोश खासकर छात्र-युवा आक्रोश की चपेट में है। एक के बाद एक देश में छात्र-युवा, मजदूर-कर्मचारी, आदमी-औरत सड़कों पर हैं। जो जनाक्रोश की लहर सितम्बर-अक्टूबर माह में फ्रांस से शुरू हुयी, वह एक-एक करके कई देशों को अपने चपेट में लेती जा रही है। दक्षिणपंथी, फासीवादी तत्व जो कि कई देशों की सत्ता में विराजमान थे अपनी सत्ता को बचाने के लिए भयंकर दमन का सहारा ले रहे हैं। फिर भी वे सार्बिया के फासीवादी नेता अलेक्जेंडर वुसिक की तरह अपनी सत्ता को अपनी आंखों के सामने जाते हुए देख रहे हैं या उसके जाने का डर सता रहा है। 
    
यूरोप में चल रहे इस व्यापक जनाक्रोश को कोई ‘सीजन आफ एंगर’ (आक्रोश का मौसम), कोई ‘पश्चिम की आंधी,’ कोई ‘2026 यूरोपीय अशांति’ तो कोई ‘सोशियो-इकोनाॅमिक प्रोटेस्ट्स’ का नाम दे रहा है। कोई इसकी तुलना 2011 के ‘अरब बसंत’ से कर रहा है तो कोई इसे ‘यूरोप का जनविद्रोह’ कह रहा है। 
    
अक्टूबर माह में फ्रांस से शुरू छात्र-युवा आंदोलन की लहर ने स्पेन, इटली, पुर्तगाल, जर्मनी, सार्बिया, यूनान, बेल्जियम, अल्बानिया, ट्यूनेशिया आदि कई देशों को अपनी चपेट में ले लिया है। हालांकि, कई देशों में फ्रांस के छात्र-युवा उभार से पहले से ही आंदोलन चल रहे थे। खासकर सार्बिया में वुसिक की फासीवादी सत्ता के खिलाफ पिछले दो सालों से जबरदस्त छात्र-युवा आंदोलन चल रहा था। फिर भी फ्रांस के छात्र-युवाओं के आंदोलन के पूरे यूरोप में व्यापक असर पैदा करने को कम कर के नहीं आंका जा सकता है। कहा जा सकता है कि फ्रांस ने एक बार फिर यूरोप को रास्ता दिखाया है। 
    
फ्रांस में जनाक्रोश की शुरूवात सरकारी स्कूलों की दुर्दशा व महंगी होती शिक्षा से हुयी थी परन्तु शीघ्र ही इसने मैक्रों की सरकार के खिलाफ जनाक्रोश का व्यापक रूप धारण कर लिया। फ्रांस में बढ़़ती महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी व सरकार के कटौती कार्यक्रम भी जनाक्रोश के निशाने पर आ गये। फिर इसमें सरकार द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन पर खर्च किये जा रहे करदाताओं के धन का मुद्दा भी जुड़ गया। जनाक्रोश के निशाने पर आये मैक्रों ने इसे दबाने के लिए व्यापक दमन का सहारा लिया है। 
    
स्पेन में एक 87 वर्षीया वृद्धा को किराये के घर से निकालने से शुरू हुआ आंदोलन, व्यापक रूप धारण करता गया। ‘हाउसिंग क्राइसिस’ (आवास की कमी का संकट), किराये के मकानों का मनमाना व बढ़ता जाता किराया, महंगाई, जीवन स्तर में गिरावट, बेरोजगारी जैसे मुद्दे जुड़ते गये। जनाक्रोश की व्यापक लहर के बीच सरकार को आम चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। 
    
सार्बिया में वुसिक की फासीवादी सरकार को उस व्यापक जनाक्रोश जो कि दो वर्ष पूर्व शुरू हुए छात्र-युवा आंदोलन से शुरू हुआ था, ने लील लिया।     
    
वुसिक की फासीवादी सरकार का वही हाल हुआ जो कुछ समय पूर्व हंगरी में विक्टर ओर्बान की फासीवादी सरकार का हुआ था। वुसिक को ओर्बान की तरह धूर्त साम्राज्यवादी शासकों ट्रम्प, पुतिन का दो तरफा समर्थन हासिल था। और दोनों ही फासीवादियों ने भारत के मोदी की तरह या तुर्की के एर्दोगान की तरह सत्ता में बने रहने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद यानी हर हथकण्डे का इस्तेमाल किया था। वुसिक के सत्ताच्युत होने को कईयों ने ‘‘राजनैतिक क्रांति’’ की संज्ञा दी। वुसिक की चुनावी हार में छात्रों की ‘‘स्टूडेंट लिस्ट’’ नामक नयी पार्टी की केन्द्रीय भूमिका थी। 
    
फ्रांस, स्पेन, सार्बिया की तरह इटली, यूनान, बेल्जियम, अल्बानिया आदि देशों में छात्र व युवा आंदोलन के सबसे अगली कतारों में थे। उन्होंने ही जनाक्रोश के शंख को फूंका था और उन्होंने ही सड़कों पर मोर्चा संभाला हुआ है। उन्होंने पुलिस के दमन का मुख्य मुकाबला किया, उन्हें ही जेलों में ठूंसा गया। 
    
यूरोप में फूटे इस जन आक्रोश की तपिश से न केवल यूरोप बल्कि पूरी दुनिया के दक्षिणपंथी व फासीवादी शासक भी परेशान हैं। अमेरिका के भ्रष्ट, धूर्त, अय्याश राष्ट्रपति ट्रम्प फ्रांस के जन उभार को बदनाम करने के लिए हर तरह की बकवासें कर रहे हैं। वह इसे अप्रवासी व कट्टर इस्लामिक पंथियों व वामपंथियों के षड्यंत्र के रूप में पेश कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही हाल दुनिया के अन्य दक्षिणपंथी व फासीवादी शासकों का भी है। हर कोई इस संभावना से आक्रांत है कि कहीं उनके देश में भी छात्र-युवा सड़कों पर न उतर जायें। सभी को पता है कि कुछ समय पूर्व दक्षिण एशिया के देशों श्रीलंका, बांग्लादेश व नेपाल में क्या हुआ था। वर्षों से जमी-जमायी सत्तायें मिट्टी में मिल गयी थीं। 
    
यहां तक कि भारत में भी हिन्दू फासीवादियों को यूरोप के छात्र-युवा उभार से भारी परेशानी हुयी है। संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर मोदी सरकार के सीनियर-जूनियर मंत्री इसकी निंदा में उतरे पड़े हैं। जबकि उनका इनसे कोई सीधा लेना-देना नहीं है। दावा कर रहे हैं कि भारत की जनता शांतिप्रिय है, वह कभी वैसा नहीं करेगी जैसा फ्रांस या सार्बिया में हुआ। मोहन भागवत ने तो ‘पश्चिम की आंधी’ कहकर अपने समर्थकों व मोदी सरकार को एक साथ डराया और चेताया है। 
    
असल में हिन्दू फासीवादियों को कुछ समय पहले भारतीय छात्र-युवाओं ने अच्छा सबक सिखाया था। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को छात्र-युवा आक्रोश के कारण इस्तीफा देना पड़ा था। और तब से मोदी, भागवत आदि को ‘पश्चिम की आंधी’ अपनी सत्ता के तम्बू के उखड़ने के रूप में एक चेतावनी के रूप में दिखायी दे रही है। और यह भी है कि ‘पश्चिम की आंधी’ के निशाने पर यूरोप में मोदी के दक्षिणपंथी व फासीवादी भाई-बिरादर खास तौर से रहे हैं। और भारत में यदि ‘‘पश्चिम की आंधी’’ पहुंची तो ये लोग ही निशाने पर होंगे। 
    
भारत अथवा पूरी दुनिया के छात्र-युवा, मजदूर-मेहनतकश, शोषित-उत्पीड़ित क्यों नहीं अपने शासकों को खासकर दक्षिणपंथी-फासीवादी शासकों को अपने निशाने पर लें। उनके जीवन को नरक बनाने में सबसे बड़ी भूमिका तो इन्हीं शासकों की है। आज जब वे निशाने पर आ रहे हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह वे स्वयं ही हैं। फ्रांस हो या इटली या फिर सार्बिया हो या फिर यूनान, इन सभी देशों में पिछले कुछ दशकों में लोक कल्याणकारी नीतियों को क्रमशः खत्म करके एकाधिकारी पूंजी के हितों में पूरे देश के संसाधनों को लगा दिया गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन आदि के बजट में कटौती करके जहां एक ओर पूंजीपतियों की जेबों को भरा गया वहीं दूसरी ओर सैन्य बजट में भारी वृद्धि की जाने लगी। और फिर रही-सही कसर साम्राज्यवादी देशों द्वारा थोपे गये युद्धों ने पूरी कर दी। पहले रूस-यूक्रेन युद्ध (यूक्रेन के पीछे अमेरिका, फ्रांस, यूके, जर्मनी के साम्राज्यवादी थे) और फिर अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किये गये हमले, और उसके साथ पूरे प.एशिया में फैले युद्ध ने ईंधन संकट वैश्विक व्यापार व मालों की आवाजाही पर गम्भीर खतरा पैदा कर दिया। इस सबके चलते पूरे यूरोप में ईंधन संकट, बढ़ती महंगाई, छिनते रोजगार व शिक्षा के लगातार महंगे होते जाने, आदि कारणों ने व्यापक सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक संकट को जन्म दे दिया। और फिर उस असंतोष, आक्रोश व क्षोभ को फूटना ही था जो इस समय यूरोप में फूटा हुआ है। क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसे ही हालात हैं इसलिए हर देश के शासक यूरोप के छात्र-युवा आंदोलन की लहर से घबराये हुए हैं। 
    
यूरोप के छात्र-युवा लहर व जन उभार की कई अच्छी बातों खासकर दक्षिणपंथी-फासीवादी ताकतों के नाक में दम करने के बावजूद इसकी बहुत सारी सीमाएं हैं। खासकर वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के चैखटे के भीतर ही अपनी समस्याओं के समाधान को खोजने की कोशिश है। सार्बिया में वुसिक के बाद सत्ता मंे आने वाली पार्टी ‘स्टूडेंट लिस्ट’ के सामने सबसे बड़़ा सवाल (अपने नौसिखियेपन के साथ) यही उठ खड़ा होगा कि वे छात्र-युवा व जन आकांक्षाओं को कैसे पूरा करें। क्योंकि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था जो कि निजी सम्पत्ति संबंधों पर आधारित है, में बदलाव किये बिना वे कैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार पर खर्च करेंगे। कैसे वे उस ‘माफिया राज’ को खत्म करेंगे जिसके खिलाफ उन्होंने नारा उछाला था ‘सार्बिया या माफिया’।
    
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इतिहास उस दिशा में आगे बढ़ रहा है जहां यह बात स्थापित होगी या की जायेगी कि मानव जाति का भविष्य पूंजीवाद नहीं सिर्फ और सिर्फ समाजवाद के जरिये ही सुरक्षित हो सकता है। उस दिशा में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से यूरोप सहित पूरी दुनिया को धकेलने के लिए इस छात्र-युवा आंदोलन की लहर की प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता है।  

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