आपका नजरिया- बढ़ती यौन हिंसा: कुंठित व्यक्तियों की फौज व नाकाम व्यवस्था

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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पूरे देश भर में शहरों से लेकर गांव तक में, हर जगह महिलाओं व बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाओं ने देश के सामने महिला सुरक्षा के सवाल को हर बार की भांति फिर से सामने खड़ा कर दिया है। स्कूल-काॅलेज की छात्राएं हों या फिर खेतों, कारखानों में काम करने वाली महिला मजदूर हों, सभी को यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है। यह तब है जब सरकार महिला सुरक्षा के ढेरों दावे-वादे करती रहती है। साथ ही ऐसे लफ्फाजी भरे नारे, जिनकी हर बार महिला उत्पीड़न के साथ लाखों बार पोल खुल रही है। 
    
यह पूंजीवादी व्यवस्था जो पतित उपभोक्तावादी संस्कृति को दिन-रात फैलाने में लगी रहती है। जिसका खामियाजा महिलाओं और लड़कियों को यौन उत्पीड़न के रूप में उठाना पड़ता है। यह व्यवस्था अपनी पतित संस्कृति के माध्यम से महिला शरीर को उपभोग की वस्तु बनाकर बाजार में मालों के रूप में प्रचारित कर खूब मुनाफा कमा रही होती है। वहीं दूसरी तरफ महिला सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण की लफ्फाजी भरी बातों का प्रचार करती नहीं थकती। साथ ही साथ निरंतर महिला अपराधों में बढ़ोत्तरी के आंकड़े इनके पाखंड को उजागर करते रहते हैं। यौन हिंसा की घटनाएं पूरी व्यवस्था की नाकामी के रूप में सवाल खड़ा कर दे रही हैं। 
    
जहां एक तरफ सरकार और उसकी नीतियां महिला विरोधी और यौन कुंठा पैदा करने वाली संस्कृति को पैदा कर रही हैं वहीं ये कुंठित व्यक्तियों की एक पूरी फौज तैयार कर रही हैं। जिनके लिए महिला या बच्ची इंसान के रूप में नहीं बल्कि उपभोग की वस्तु के रूप में दिखाई और प्रचारित की जाती है। यह सोच सिर्फ सामान्य व्यक्तियों की नहीं बल्कि सत्ताधारी पार्टियों के नेताओं में भी पाई जाती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ये सोच व्यवस्था की रग-रग में फैली हुई है। यहां महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ कुछ अपराधियों को सजा दे देने से ही नहीं जुड़ा है बल्कि पूरी सड़ी-गली पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे से जुड़ा हुआ है। 
    
हालिया घटनाएं जो दिल्ली-बिहार में घटित हुई हैं, वह कोई सामान्य घटनाएं नहीं हैं बल्कि एक पूरी सोच है जिसको ये व्यवस्था पैदा करती है। अब देखा ये जा रहा है कि ऐसे अपराधियों में कानून का डर खत्म हो चुका है। ये अपराधी कानून को मुंह चिढ़ा रहे हैं। ऐसे अपराधी सत्ताधारी अपराधियों का एक प्रकार से अनुसरण कर रहे होते हंै। ये सत्ताधारियों से सीख रहे होते हैं कि जब ऐसी घटनाओं को अंजाम देने से नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ता तो हमारा भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। और अधिकतर मामलों में होता भी ऐसा ही है। दूसरा राजनेताओं और न्यायाधीशों के महिला विरोधी बयान या फैसले भी इनके हौंसले बढ़ा रहे होते हैं।
    
दिल्ली के कालकाजी में एक पार्क में नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जिसका छात्राओं व आमजनों ने मिलकर विरोध किया। इस घटना का श्री राम कालेज के प्रशासन ने फायदा उठाया और एक फरमान जारी कर कहा कि अब छात्राओं को अपने घरों से आनलाइन क्लासेज लेनी होंगी। छात्राओं ने इस फरमान को अपने अधिकारों का हनन मानते हुए जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। इस फैसले के पीछे कालेज प्रशासन का तर्क था कि यह फैसला छात्राओं की सुरक्षा और भलाई के लिए लिया गया है। कालेज प्रशासन के इस फैसले ने ढेरों सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला ये कि क्या हमारा सुरक्षा तंत्र ऐसे अपराधियों के सामने समर्पण कर चुका है? या ये अपराधी इतने बलशाली हो गए हैं कि सुरक्षा तंत्र उनके सामने बौना पड़ गया है?
    
इसका जवाब हां में देना गलत नहीं होगा। इसके अलावा अन्य वजह भी हैं। वह यह कि वर्ष के शुरूआत से ही देश में मजदूरों-छात्रों व अन्य मेहनतकश जनता के संघर्षों की एक पूरी लहर चली आ रही है जो रुकने का नाम नहीं ले रही है। जिसका परिणाम यह निकला कि निरंकुश सरकार को संघर्षों के सामने झुकना पड़ा। अब ये ही डर  सिर्फ काॅलेज प्रशासन को ही नहीं पूरे तंत्र को सता रहा है। पूरा तंत्र अच्छी तरह जानता है कि अगर यहां इस विरोध को नहीं रोका गया तो ये और ज्यादा बढ़ सकता है। इस बात की दहशत शासन-प्रशासन और कालेज प्रशासन के अन्दर गहराई से बैठी हुई है। शासन-प्रशासन छात्रों द्वारा जंतर-मंतर पर किए गए संघर्ष के सदमे से अभी उबरा नहीं है। इसलिए ये भांति-भांति के बहाने बनाकर छात्रों पर अंकुश लगाने का तुगलकी फरमान जारी कर रहे हैं। इन्हें डर है कि कहीं छात्र अपने इस संघर्ष की मशाल को जलाए न रखें। वर्तमान के संघर्षों ने भी ये सिद्ध कर दिया है कि बड़े से बड़ा तानाशाह जनता के संघर्षों के सामने घुटने टेक देता है। भारत में जो लहर संघर्ष की चल पड़ी है उसको क्रांतिकारी वेग से चलाने की जरूरत है।             -एक पाठक

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