केन्या में गहराता संकट, बढ़ता दमन और प्रतिरोध

/kenya-mein-gaharata-sankta-badhata-daman-and-pratirodh

विलियम रूटो केन्या के राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपतित्व काल में केन्या की मजदूर-मेहनतकश आबादी की हालत खराब होती गयी है। वहां बेरोजगारी 67 प्रतिशत के आस-पास है। रूटो 2023 में राष्ट्रपति बने थे। जून, 2024 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में करों में भारी वृद्धि की थी। इस वृद्धि के विरुद्ध जनरेशन जेड (जनरेशन जेड उस पीढ़ी को कहा जाता है जो 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक के मध्य पैदा हुई) के नौजवानों का व्यापक पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। उस विरोध प्रदर्शन को रूटो की पुलिस ने बेरहमी से कुचला था। इस पुलिसिया दमन में उस समय 60 से ज्यादा लोगों की जान गयी थी। इस वर्ष जनरेशन जेड के लोगों ने उस आंदोलन की वर्षगांठ मनाने का फैसला लिया था। वर्षगांठ मनाने के पहले ही 17 जून को एक शिक्षक और ब्लॉगर को गिरफ्तार कर लिया गया और पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गयी। इसके बाद समूचे केन्या में विरोध प्रदर्शनों की लहर आ गयी। सत्ता ने बर्बरता के साथ विरोध प्रदर्शनों को कुचला और वर्षगांठ के दिन कम से कम 21 लोग विरोध प्रदर्शनों में पुलिस की गोली से मारे गये। केन्या के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का कहना है कि उस दिन कम से कम 38 लोग मारे गये और 130 लोग घायल हुए। 
    
एक अनुमान के अनुसार, रूटो के शासनकाल के दौरान 140 से अधिक प्रदर्शनकारियों को मार डाला गया है। इस दौरान हजारों लोग घायल हुए हैं और कई सारे लोगों को जीवन भर के लिए अपंग बना दिया गया। इसके अतिरिक्त सैकड़ों लोग लापता हैं या उनका अपहरण कर लिया गया है। 
    
रूटो की सत्ता इस तरह के क्रूर दमन का सहारा इसलिए ले रही है क्योंकि केन्या की व्यापक आबादी की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा खराब है और वह इसे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। एक अनुमान के अनुसार, केन्या की 34 प्रतिशत आबादी 2.15 डालर प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रही है। इस आबादी का 38 प्रतिशत राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे का जीवन जी रहा है और 29 फीसदी अत्यधिक अभाव में जीने को मजबूर है। रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। खाद्यान्न की कीमतें बढ़ती गयी हैं। दण्ड के बतौर कर लगाये जा रहे हैं। सार्वजनिक कर्ज बढ़ता जा रहा है। 
    
इस समय प्रदर्शनकारियों को सामूहिक रूप से गिरफ्तार किया जा रहा है। गिरफ्तार लोगों पर 20,000 से 50,000 केन्याई शिलिंग की जमानत लगाई जा रही है जो 155 से 387 अमरीकी डालर के बराबर होती है। यह और खतरनाक उस समय हो जाता है जब केन्या में न्यूनतम मासिक वेतन महज 116 अमरीकी डालर के बराबर है। इससे भी बढ़कर स्थिति ग्रामीण इलाकों की है जहां की मासिक आय 62 से 93 अमरीकी डालर के करीब है। 
    
केन्याई सत्ता कितनी बेरहम और बर्बर है इसकी बानगी राष्ट्रपति रूटो के उस सार्वजनिक संबोधन में मिलती है जिसमें उसने पुलिस से कहा ‘‘जो कोई भी किसी और के व्यवसाय और सम्पत्ति को जलाता है, उसे पैर में गोली मार दी जाय...उन्हें मारना नहीं, बल्कि उनको गोली मारकर पैर तोड़ देना चाहिए।’’
    
अंग भंग करने का यह क्रूर आह्वान, प्रदर्शनकारियों की हत्या जारी रखने का ही एक रूप है। यह राज्य द्वारा बरपा किये गये नरसंहारों के बाद आया है। यह ज्ञात हो कि इस वर्ष की शुरूआत से ही रूटो के इस्तीफे की मांग हो रही है। 
    
इस समय ऐसी स्थिति है कि रूटो की सत्ता ने प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। राजधानी नैरोबी में सेना की तरह की चौकियां स्थापित कर दी गयी हैं। विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट और मीडिया बंद कर दिया गया। अपहरण, यातना और दमन के लिए विशेष खुफिया इकाईयां गठित की गयी हैं। 
    
राष्ट्रपति रूटो आंदोलन को कुचलने के लिए उसमें फूट डालने की नीति अपना रहे हैं। वे इसे एक कबीले का आंदोलन बताकर दूसरे कबीलों को उसके विरुद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। वे इसे किकियू कबीले के नेतृत्व में सत्ता के विरुद्ध विद्रोह कह रहे हैं। 
    
जबकि हकीकत यह है कि जनरेशन जेड के इस आंदोलन में समाज के विभिन्न वर्गों और पेशों के और अधिकांश कबीलों के लोग शामिल हैं। 
    
यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि तमाम पूंजीवादी पार्टियां और सुधारवादी ट्रेड यूनियनें पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के मामले में एकमत हैं और ‘रूटो गद्दी छोड़ो’ आंदोलन के एक सीमा से बाहर जाने से वे आंदोलनकारियों के विरोध में खड़़ी हो गयी हैं। 
    
अधिकांश ट्रेड यूनियनें सुधारवादी नेतृत्व के हाथों में हैं और वे मजदूरों को इस संघर्ष में शामिल होने से रोक रही हैं। 
    
केन्या का शासक वर्ग, अमरीकी साम्राज्यवादियों और चीनी साम्राज्यवादियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में लगा है। केन्या में अमरीकी साम्राज्यवादियों के अफ्रीकाम के फौजी अड्डे हैं। लम्बे समय से अन्य अफ्रीकी राज्यों की तरह केन्या भी पश्चिमी साम्राज्यवादियों विशेष तौर पर अमरीकी साम्राज्यवादियों की छत्रछाया में रहा है। इधर कुछ वर्षों से चीनी साम्राज्यवादियों का प्रभाव समूचे अफ्रीका में बढ़ा है। अन्य अफ्रीकी शासकों की तरह केन्या के शासक भी चीन के साथ अपना सम्बन्ध प्रगाढ़ कर रहे हैं। 
    
इसके चलते अमरीकी साम्राज्यवादी रूटो के दमनकारी कदमों पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी रूटो को पूर्णतः अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश में इस जनरेशन जेड आंदोलन का इस्तेमाल करने में लगे हैं। 
    
मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तमाम अफ्रीकी शासकों को अपने पक्ष में लाने के लिए व्हाइट हाउस में दावतें दे रहे हैं। 
    
लेकिन अफ्रीकी शासक अमरीकी साम्राज्यवादियों की गिरती हैसियत और चीनी साम्राज्यवादियों की उभरती हैसियत को ध्यान में रखते हुए किसी एक पक्ष के साथ अतीत की तरह पूर्णरूपेण जाने को तैयार नहीं हैं। 
    
ये अफ्रीकी शासक भी, जिसमें केन्या के शासक भी हैं, अपने-अपने देश के मजदूर-मेहनतकश आबादी के दुश्मन हैं और हर कीमत पर इस पूंजीवादी व्यवस्था के पोषक हैं। वे साम्राज्यवादियों के बीच मतभेदों और टकराहटों का इस्तेमाल अपने वर्ग स्वार्थों के लिए करना चाहते हैं। इसलिए केन्या के विरोधी पार्टियों के नेता भी जनरेशन जेड आंदोलन के विरोध में खड़े हो जाते हैं। 
    
सुधारवादी ट्रेड यूनियनों का भी इस व्यवस्था को बचाये रखने में स्वार्थ है। 
    
जनरेशन जेड का नेतृत्व भी अभी इस व्यवस्था से मोह पाले हुए है। हालांकि मोहभंग हो रहा है। लेकिन इसके लिए मोहभंग होना ही पर्याप्त नहीं है। एक सही वर्ग दृष्टि जरूरी है और यह मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन से ही आ सकती है। 

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।