टैरिफ युद्ध और ऑटो उद्योग

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बीते दिनों अमेरिका की ट्रम्प सरकार ने विदेशी निर्मित कारों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। ट्रम्प की इस घोषणा से वैश्विक आटो उद्योग में उथल-पुथल मच गयी है। लगभग दुनिया की हर ऑटो कम्पनी ट्रम्प की इस घोषणा से प्रभावित हुई है। 
    
अनुमान लगाया जा रहा है कि ऑटो उद्योग को ट्रम्प की इस घोषणा से सालाना 110 अरब डालर का नुकसान होगा। इस तटकर वृद्धि से अमेरिकी आटो कम्पनियां फोर्ड और जनरल मोटर्स भी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। दोनों कम्पनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज हुई है। दोनों कम्पनियां अपनी आय में 30 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगा रही हैं। 
    
इससे पूर्व ट्रम्प कनाडा और मैक्सिको पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर चुके हैं। अब कारों पर 25 प्रतिशत टैरिफ थोपने का अर्थ यह है कि अमेरिका में आयातित होने वाली कुछ कारों पर टैरिफ 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ जायेगा। 
    
अनुमान है कि अमेरिका-मैक्सिको-कनाडा में फैली इस उद्योग की जटिल आपूर्ति श्रंखलाओं में व्यवधान के चलते अमेरिका के संयंत्रों में लगभग 20 हजार वाहन प्रतिदिन कम बनेंगे। गौरतलब है कि अमेरिकी आटो कम्पनियों के कई प्लांट विदेशों में स्थित हैं और उनके ढेरों पुर्जे अन्य देशों से आयात होते हैं। इसीलिए उन पुर्जों व तैयार वाहनों के आयात पर तटकर वृद्धि का खामियाजा अमेरिकी आटो कम्पनियां उठायेंगी। 
    
तटकर वृद्धि की मार जापानी, कोरियाई व जर्मन कम्पनियों पर भी पड़ेगी। 2024 में अमेरिका में बिकने वाले आधे वाहन विदेशों में असेम्बल किये गये थे। टोयटा ने गत वर्ष 23 लाख वाहन अमेरिका में बेचे थे जिसमें उसने आधे अमेरिका में बनाये थे व शेष जापान-मैक्सिको व कनाडा में बनाये थे। अमेरिका में निर्मित उसके वाहनों पर भी तटकर बढ़ने का प्रभाव इस रूप में पड़ेगा कि कनाडा-मैक्सिको से आयातित पुर्जों के दाम अब बढ़ जायेंगे।
    
कुल मिलाकर अमेरिका में बिकने वाले आधे वाहन व 60 प्रतिशत पुर्जे आयातित होते हैं। इस तरह अमेरिकी-कोरियाई-जापानी-जर्मन सभी ऑटो कम्पनियां इस तटकर वृद्धि से प्रभावित होंगी।
    
तमाम देशों की अर्थव्यवस्थायें भी इस तटकर वृद्धि का असर झेलेंगी क्योंकि आटो उद्योग कई देशों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जापान के सकल घरेलू उत्पाद में 0.2 प्रतिशत या 8.78 अरब डालर की कमी आने का अनुमान है। यूरोपीय संघ पर यह असर कहीं ज्यादा होगा। 
    
अब चूंकि कनाडा व यूरोपीय देशों ने इसके जवाब में अमेरिकी मालों के आयात पर तटकर बढ़ाने की धमकी दी है इसलिए ट्रम्प द्वारा प्रत्युत्तर में और कठोर कर नीति से अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभाव और बढ़ सकता है। 
    
ट्रम्प ‘अमेरिका प्रथम’ के नारे के तहत तटकर बढ़ाकर अमेरिकी कंपनियों को लाभ का ख्वाब दिखा रहे थे पर वास्तव में उनके कदम अमेरिकी कम्पनियों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। अब ये कम्पनियां अपना उत्पादन व पुर्जों का उत्पादन अमेरिका में ही कर नुकसान की भरपाई कर सकती हैं। इस तरह ट्रम्प के कदम वैश्वीकरण के दौर में कायम हुई वैश्विक उत्पादन व मूल्य श्रंखलाओं को बुरी तरह प्रभावित करने की ओर ले जा रहे हैं। 
    
सभी आटो कम्पनियां इस तटकर वृद्धि के चलते उत्पादन कम करने, मूल्य बढ़ाने को बाध्य होंगी। इसके साथ ही प्रतियोगिता में टिके रहने के लिए वे अपने ऊपर लादे बोझ को मजदूर वर्ग पर स्थानांतरित करने की ओर बढ़ेंगी। छंटनी व वेतन कटौती को झेलने को मजदूर वर्ग को मजबूर कर दिया जायेगा। इस तरह ट्रम्प के इन कदमों का खामियाजा मजदूर वर्ग को अपनी गिरती हैसियत तो देशों को डांवाडोल होती अर्थव्यवस्था के रूप में उठाना पड़ेगा। वैश्वीकरण की नीतियों का खामियाजा मजदूर वर्ग बीते कुछ दशकों से उठा रहा है अब वैश्वीकरण में बाधा डालने के प्रयासों का भी उसे ही खामियाजा उठाना पड़ेगा।   

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