फासीवाद

वंदे मातरम की अनिवार्यता

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हाल ही में वंदे मातरम के गायन को लेकर मोदी सरकार ने नये दिशा-निर्देश जारी कर दिये हैं। इसके तहत वंदे मातरम को कई आधिकारिक कार्यक्रमों में गाया जाना अनिवार्य बना दिया गया

रौशन है अमन-भाईचारे की लौ

हिन्दू फासीवादियों द्वारा देश में लगातार नफरत का माहौल बनाया जा रहा है। इस नफरती माहौल के कारण जब तब वहशी, वीभत्स घटनाएं सामने आ रही हैं। कहीं यूं ही बुजुर्ग मुसलमान को न

फिर एक बार महात्मा बुद्ध और फासीवादी हिटलर

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खबर है कि बिहार सरकार ने धार्मिक स्थलों और शिक्षण संस्थानों के पास मांस-मछली के बेचने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। बिहार के भाजपाई उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

रंग में भंग

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पिछले दिनों नई दिल्ली में ‘इण्डिया ए आई इम्पैक्ट समिट’ का आयोजन पूरी रंगबाजी में हुआ। यह समिट अपने पहले दिन से ही अपनी खास शैली में प्रधानमंत्री मोदी के आत्म प्रचार, चोरी

एक इंसान की चुनौती से घबराये संघी

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उत्तराखण्ड को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाने पर उतारू संघी आजकल घबराये हुए हैं। सत्ता पर संघी मुख्यमंत्री धामी के काबिज होने, सारी शासन सत्ता अपने हाथ में होने के बावजूद य

जनता का चुनाव करते हिंदू फासीवादी

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देश में चुनाव के दौरान अक्सर ही गुस्से में आकर कई लोग कहते सुने जाते हैं कि अब उक्त पार्टी को हम वोट नहीं करेंगे। लंबे समय से यही देखा गया है कि किसी एक पार्टी की सरकार क

एस आई आर : मुसलमानों के नाम काटने के हथकंडे

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संघ-भाजपा में एक प्रतियोगिता चल रही है। यह प्रतियोगिता इस बात की है कि कौन सा नेता कितना घटिया-जहरीला-नफरती बयान दे सकता है। कौन मुसलमानों को कितनी भद्दी भाषा में गरिया स

नारा राम का कर्म शैतान का

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किसी जमाने में ‘जय श्री राम’ का नारा गूंजने पर महसूस होता था कि कोई धार्मिक आस्थावान टोली मंदिर की ओर पूजा के लिए जा रही हो। पर आज इस नारे के तेवर और अर्थ बदल गये हैं। इस

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।