संघर्ष की आग और दमन का चेहरा

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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आईएमटी मानेसर के मजदूरों की आपबीती

आईएमटी मानेसर, जो औद्योगिक विकास का प्रतीक माना जाता है, आज मजदूरों के आंसू और खून से लिखी एक दर्दनाक कहानी बयां कर रहा है। होंडा से लेकर कम से कम 15 से 20 फैक्टरी ने आंदोलन किया और तो और रिचा ग्लोबल एक्सपोर्ट्स (सेक्टर 7) में मजदूरों के साथ जो हुआ, वह केवल एक लाठीचार्ज नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ पर हमला है जिसे ‘न्याय’ कहते हैं।
    
जब मजदूरों ने अपनी बुनियादी जरूरतों और रोटी के लिए आवाज उठाई, तो बदले में उन्हें क्या मिला?
    
कंपनी के बाहर ही नहीं, बल्कि मजदूरों के निजी कमरों में घुसकर उन्हें पीटा गया। सिर फोड़े गए और उन्हें लहूलुहान किया गया।
    
कुल 56 और जिसमें 20 महिला मजदूर शामिल हैं, को हिरासत में लेकर उनके परिवारों में खौफ पैदा कर दिया गया। उन बच्चों और परिजनों की मानसिक स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल है, जिनके अपने का कोई पता नहीं कि कैसे हैं, कहा हैं।
     
12 अप्रैल को इंकलाबी मजदूर केन्द्र व बेलसोनिका यूनियन के 6 नेताओं की भी षड्यंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तारी।
    
विडंबना देखिए कि जब वार्ता की मेज सजती है, तो लेबर विभाग, कंपनी मैनेजमेंट और पुलिस अधिकारी एक ही भाषा बोलते नजर आते हैं। वहां मजदूर अकेला खड़ा होता है, और पूरी व्यवस्था दूसरी तरफ।
    
संविधान सबको अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके विपरीत है। मजदूरों पर मुकदमे थोपना और उन्हें अपराधी की तरह पेश करना यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था पूंजीपतियों के हितों की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय है।
    
‘‘क्या इस देश में मजदूर की कोई इज्जत या सुरक्षा नहीं है? क्या रोटी मांगना इतना बड़ा गुनाह है कि उसे बेरहमी से पीटा जाए?’’
    
 इतने दमन और मारपीट के बावजूद, मानेसर के मजदूरों ने यह साबित कर दिया कि उनकी एकता को लाठियों से नहीं तोड़ा जा सकता। शासन और प्रशासन ने उन्हें डराने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन मजदूरों का संघर्ष जारी रहा।
    
अंततः, जब मजदूरों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया, तो उन्हें जीत की एक लहर दिखाई दी। यह जीत केवल कुछ मांगों को मनवाने की नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि मजदूर अब जागरूक हो चुका है।
    
वह समझ गया है कि ‘लोकतंत्र’ के नाम पर कौन किसके लिए काम कर रहा है।
    
एकता ही एकमात्र हथियार है जिससे शोषण की दीवारें गिराई जा सकती हैं।
    
रिचा ग्लोबल की घटना भारतीय औद्योगिक इतिहास के पन्नों पर एक काले धब्बे की तरह रहेगी। लेकिन यह घटना आने वाले समय में हर उस मजदूर के लिए प्रेरणा बनेगी जो जुल्म के खिलाफ खड़ा होना चाहता है। सत्ता और पूंजी का गठजोड़ चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, संगठित मजदूर वर्ग की इच्छा शक्ति के आगे उसे झुकना ही पड़ता है।

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