पत्र

सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज हुआ मुश्किल

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हिन्दू धर्म की ठेकेदार भाजपाई सरकार अधिकतर राज्यों और केन्द्र में काबिज है। इन्होंने अभी तक देश में धार्मिक उन्माद व नफरत फैलाने में वरीयता हासिल की है। अगर इस मामले में

कहानी - नदामत (पश्चाताप)

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वृद्ध माता की उम्र 65 वर्ष के आस-पास है। जीवनसाथी का देहांत हुए एक अरसा बीत चुका है जो जाने से पहले किराए के पांच कमरे छोड़ गए थे। दोनों बेटे बाहर ही रहते हैं और तीज-त्यौह

हैप्पी दीपावली

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दीपावली की तैयारी महीनां पहले से शुरू हो जाती है। हर कोई तैयारी कर रहा होता है दीपावली को लेकर। कोई कुछ खरीदना चाहता है तो कोई कुछ। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। चड्ढी-बनि

UPSC की बीमारी

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शुरूआती समय में UPSC की तैयारी की सोचता था तो मुखर्जीनगर और बत्रा सिनेमा स्वप्नलोक की दुनिया जैसा था। मुझे लगता था कि बौद्धिकता और नैतिकता का केंद्र यहीं पर होगा क्योंकि

न्याय पाने में बाधा बनता पुलिस प्रशासन

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22 सितंबर 2025 की शाम को बवाना औद्योगिक क्षेत्र के सेक्टर 4 के डी ब्लाक के प्लाट नंबर 165 में स्थित एक फैक्टरी के मजदूर (राजेश शाह) की लिफ्ट गिरने से चोट लग जाने से मृत्य

फैक्टरी में अपंग बनते मजदूर

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कानपुर देहात के मोगनी पूरबराया के इंदिरा नगर कालोनी निवासी शीबू कुमार फरीदपुर बरेली में केसरपुर के पास स्थित एल्युमिनियम फैक्टरी में काम करते थे। शीबू कुमार ने बताया कि व

और उन्होंने कुछ नहीं खाया

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उस दिन गुड़गांव से बरेली जाने के लिए टनकपुर एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा था। ट्रेन का टाइम रात 10 बजे का था पर ट्रेन 30 मिनट लेट है, की उद्घोषणा बार-बार होते हुए 5 घंटे बाद

जनता के पैसे से छवि चमकाते प्रधानमंत्री

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी धूमिल होती छवि चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। पिछले साल गुजरात में भी ऐसी ही एक घटना घटी, जब 7 अक्टूबर 2024 को गुजरात सरकार ने कुछ विज्ञापन

स्पीड पोस्ट

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भीमकाय मशीनों का शोरगुल, धूल और घुटन भरी हवा। सुरक्षा के नाम पर अस्पताल में प्रयोग होने वाला नोज मास्क। शाम तक नाक के भीतर काली लोहा मिश्रित गर्द जम चुकी है। खांसने पर का

किर्बी के मजदूर नेताओं पर लगाये फर्जी मुकदमों का विरोध करो

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हम किर्बी बिल्डिंग सिस्टम्स के सिडकुल हरिद्वार में काम करने वाले श्रमिक हैं। हम फैक्टरी में पिछले लगभग 20 सालों से कार्य कर रहे हैं। हमारी फैक्टरी में स्थायी एवं अस्थायी

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।