कविता
डेविड डियोज की दो कविताएं
गिद्ध
उन दिनों
जब सभ्यता हमारे चेहरों पर लात मार रही थी
जब पवित्र जल हमारी सिकुड़ी हुई भौहों पर
तमाचे जड़ रहा था
गिद्ध अपने पंजों के साये में
सुनो ! स्त्रियों, सुनो ! -मृगया शोभनम्
तुम्हारे हृदय
में उठे तूफान को
आसान तो नहीं
समझना।
आसान तो नहीं
व्यक्त करना।
वर्णमाला -मंगलेश डबराल
एक भाषा में अ लिखना चाहता हूं
अ से अनार अ से अमरूद
लेकिन लिखने लगता हूं
अ से अनर्थ अ से अत्याचार
कोशिश करता हूं कि क से कलम या करुणा लिखूं
किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है? -बाबा नागार्जुन
किसकी है जनवरी,
किसका अगस्त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?
लाल हमारा रंग -अफ्रीकी कवि ए एम सी कुमात
हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है
जिनमें खून की रंग की आभा है
और दुश्मनों के लिए जिनसे आती है
यम के बैल की घंटी की आवाज,
कविताएं
राजा नंगा है -रूपरेखा वर्मा
वो डरता है
बंदूकधारी सुरक्षाकर्मियों के घेरों के
बावजूद
वो डरता है
मज़बूत किले में हिफाज़त के
बावजूद
वो डरता है
झूठी डिग्रियों की सनद के
बावजूद
मरम्मत से काम बनता नहीं -विजय गौड़ (16 मई 1968-21 नवम्बर 2024)
आपके साथ जो हुआ वह
निश्चित ही अन्याय है पर,
आपके बेटे की क्या गलती
जो बेशक बहुत अव्वल नहीं
लेकिन जिसके लिए किसी विद्यालय में
पढ़ने का अवसर नहीं
सुनो! संघियो, मैं तुम्हारे मुंह पर कहती हूं -मृगया शोभनम्
सुनो!
संघियो, सुनो !
मैं तुम्हारे मुंह पर कहती हूं,
तुम्हारी हर बात झूठी है
तुम्हारी धर्म की व्याख्या झूठी है,
तुम्हारा इतिहास का बखान झूठा है,
तुम जल समाधि की तैयारी करो -मृगया शोभनम्
मेरी हत्या
मेरी आंखों के सामने हुयी
मैं जितना प्रतिरोध कर सकती थी,
मैंने किया।
मैंने हत्यारों को घायल किया
अपने दांत उनके हाथों में
गड़ा दिये
राष्ट्रीय
आलेख
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।