ये तो होना ही था
अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। श
अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। श
यह एक सच्चाई है कि जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे उससे कहीं अधिक लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के हमले, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे जो चुके हैं। और यह भी सच है कि जब तक साम्राज्यवाद, पूंजीवाद जिन्दा रहेगा तब तक मानव जाति का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा।
बूढ़े लोग पूरे घाघपने, धूर्तता के साथ दुनिया पर शासन कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प (79), शी जिनपिंग (73), पुतिन (73), लूला (80), मोदी (75) जैसे बूढ़े दुनिया के अधिकांश देशों म
बदमाश ट्रम्प व धूर्त नेतन्याहू का न केवल जनता के बीच बल्कि स्वयं शासक वर्ग की कतारों के बीच भी विरोध तेजी से बढ़ा है। इस कारण इन दोनों के तेवर पहले दिनों के मुकाबले बाद में ढीले पड़ने शुरू हुए हैं। दोनों ही देशों में ट्रम्प व नेतन्याहू को आगामी महीनों में चुनाव का सामना करना है। युद्ध का लम्बा खिंचना इन दोनों ही धूर्तों के राजनैतिक भविष्य पर संकट खड़ा करने लगेगा। और ठीक यही ईरान चाहता है।
आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे तसल्ली से इस बात पर विचार करती हैं कि सही क्या और गलत क्या है। मुक्ति क्या और गुलामी क्या है। उनका अतीत क्या व भविष्य क्या है। कौन उनका साथी है और कौन उनकी मुक्ति की राह में रोड़ा है।
हकीकत में क्या हुआ है? भारत के स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। और एक तरीके से अपने इतिहास को फिर से दुहरा दिया है। आजादी की लड़ाई के समय ये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ‘आज्ञाकारी सेवक’ थे और आज ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आज्ञाकारी अनुचर बने हुए हैं।
इन मुक्त व्यापार समझौतों को मोदी सरकार अपनी बहुत बड़ी सफलता व उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है। सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं। और एक से बढ़कर एक काल्पनिक आंकड़े पेश किये जा रहे हैं।
वेनेजुएला की स्वतंत्रता व सम्प्रभुता पर अमरीकी साम्राज्यवादी आक्रमण की हर ओर से निंदा हुयी है। कुछ ही ऐसे शासक हैं जो मोदी की तरह मौन या तटस्थ हैं। और बहुत-बहुत थोड़े से हैं जो इजरायल के नेतन्याहू की तरह हैं जो निर्लज्जतापूर्वक ट्रम्प के साथ खड़े हैं। क्यांकि वे भी ट्रम्प की ही तरह नमूने हैं। खास बात यह है कि ट्रम्प का सबसे ज्यादा विरोध स्वयं स.रा.अमरीका में हुआ है। बड़े-बड़े विशाल जुलूस निकले हैं जिनमें वेनेजुएला पर अमरीकी हमले की निंदा की गयी है।
पूरी दुनिया के पैमाने पर नये साल का जश्न बहुत पुरानी बात न होकर महज बीसवीं सदी की बात है। शहरों के मुख्य चौराहों-बाजारों या ऐसे ही सार्वजनिक स्थलों पर उन्मादी भीड़ का जश्न तो बहुत ही हालिया घटना है। ‘पापुलर मास कल्चर’ (लोकप्रिय जन संस्कृति) बनवाने में पूंजीपतियों खासकर होटल-पर्यटन-मनोरंजन आदि से जुड़े कारोबारियों की अपनी खास भूमिका है। और इस जश्न में जिनकी पौ-बारह होती है वे पूंजीपति ही हैं। मध्यम वर्ग जश्न के उन्माद के बीतने के बाद हिसाब-किताब लगाता है। मजदूर वर्ग अपने थके हुए जिस्म व सतायी हुयी आत्मा को जश्न के उन्माद से राहत पहुंचाने की कोशिश करता है।
इस वर्ष हमारे देश में जो-जो कुछ घटा (भारत-पाकिस्तान युद्ध, कथित आतंकवादी घटनाएं, पंजाब व अन्य राज्यों में बाढ़ से तबाही, गिरता रुपया, बढ़ती जाती बेरोजगारी व महंगाई आदि) उसक
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।