कैसा लगता है दलित होना

Published
Sun, 02/01/2026 - 07:00
/kaisa-lagata-hai-dalit-hona

आधे घंटे से मेरे आंसू नहीं रुक रहे हैं। यह किसी वंशानुगत बीमारी की तरह लग रहा है। गला रुंध रहा है, छोटी हिचकियां उठ रही हैं। हिचकियां दबाने से गला दुखता है। 
    
एक देश है, जिसके नागरिक शोषण करने के अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे हैं। 
    
मैं भाषा में कभी नहीं बता पाऊंगा कि कैसा लगता है दलित होना। अपने होने को हर रोज सहता हूं। यह बहुत अजीब है कि मुझे मेरी देह और नाम के साथ मेरी जाति हमेशा याद रहती है। देह नष्ट हो जाएगी, मेरी जाति अमर रहेगी। अग्नि उसे जला नहीं पाएगी, जल गला नहीं पाएगा, वायु सुखा नहीं पाएगी।
    
अपने होने की त्रासदी जब-जब मुझ पर खुलती है, घंटों रोता रहता हूं। कभी-कभी लगता है यह मेरे पुरखों की रुलाई है। अकेला इंसान इतना नहीं रो सकता। मुझमें मेरे पुरखे चीखते हैं, मेरा समूह कलपता है। क्या चाहा था उन्होंने? नहीं बताऊंगा। 
    
वे जो करते हैं, वे हिंसा को नहीं जानते, अपमान को और बहुपरतीय शोषण-प्रारूपों को नहीं पहचानते। उनकी एक तिरछी मुस्कान भी कैसे तलवार का काम कर जाती है। उन्हें यह करने का अभ्यास विरासत में मिला है। पर मैं पहचानता हूं। मैं मनुष्य की आत्मा सूंघ सकता हूं। वह, जिसने अभी शब्द भी नहीं उठाये उसे भी जान सकता हूं। वह एक दृष्टि होती है, घृणा और हीनतर समझने की पुरातन प्रेरणा में डूबी हुई। बस एक निगाह, जो मेरी तरफ उठी थी, जिसको मैं अपने जन्म से पहचानता हूं। वह बता देती है, सामने खड़ी देह में कौन रहता है! 
    
बीते जीवन, मैं उस स्त्री से लिपटकर रोता रहा और उसे लगता रहा कि मैं अपने खो गए प्रेम की स्मृति का सूखता पौधा सींच रहा हूं। उससे कभी नहीं कह पाया उस रुलाई में मेरी समूची जाति का दुख पानी भर रहा था। बताने के बाद पता नहीं वह जगह बचती या नहीं! वह एक स्पर्श होता है, जब आदिम अंधेरा छुआ जाता है या उससे दूर हुआ जाता है। 
    
मुझमें व्यक्तियों के लिए घृणा नहीं, विचारधाराओं के लिए है। इकाई के लिए आक्रोश नहीं, समूह के लिए है। फिर भी, मैं लोगों से, जीवन से और पृथ्वी से प्यार करता हूं। मैं सम्भावनाशील सही‘यों’ से भी प्यार करता हूं। मैं आकण्ठ प्रेम में डूबा हुआ हूं पर प्रेम का चरित्र मेरी जाति से बाहर नहीं है। 
    
प्रेम भय उपजाता है। स्वाद पीड़ा देता है। करुणा संशय देती है। ज्ञान पीड़ित करता है। 
    
कैसा लगता है दलित होना? नहीं बताऊंगा। यदि आप दलित हैं, संवेदनशील हैं और भाषा आपको आती है, तब आपको हर रोज अपने लिए श्रद्धांजलियां लिखनी होगी। - विहाग वैभव
       28/01/26 दिन का तीसरा पहर

 

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।