आजकल पूंजीवादी दायरों में ‘रेजीम चेन्ज’ की काफी चर्चा है। भाजपा, संघ परिवार और उनके समर्थक सरकार विरोधियों पर हिंसा के जरिये ‘रेजीम चेन्ज’ करने का आरोप लगा रहे हैं जबकि विपक्षी भांति-भांति के तरीकों से अपना बचाव करते नजर आ रहे हैं। कुछ कह रहे हैं कि वे ‘रेजीम चेन्ज’ की बात नहीं करते। कुछ कह रहे हैं कि उनका आशय चुनावों के जरिये सरकार बदलने से है। कुछ कह रहे हैं कि उनका लक्ष्य तो बस मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा तथा विशेष गहन पुनरीक्षण को रद्द करवाना है।
‘रेजीम चेन्ज’ के इस आरोप-प्रत्यारोप ने इस देश के मजदूर-मेहनतकश जनता के सामने एक चीज एकदम साफ कर दी। वह यह कि मोदी सरकार के विरोधी तमाम विपक्षी दल जुबानी तौर पर भी ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की बात नहीं करते। वे बस भाजपा सरकार को हटाकर अपनी सरकार बनाना चाहते हैं। लेकिन साथ ही इसने यह बात भी साफ कर दी कि भाजपाई या संघी अपनी सरकार को सरकार की तरह नहीं बल्कि ‘रेजीम’ या व्यवस्था की तरह देखते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी सत्ता पर पकड़ इतनी मजबूत है कि उन्हें बस हिंसा के जरिये ही सत्ता से हटाया जा सकता है, चुनाव के जरिये नहीं। कबूतर की तरह आंख मूंदे विपक्षी दलों के विपरीत संघी या भाजपाई अपनी सरकार के चरित्र के बारे में ज्यादा सही जमीन पर हैं।
संघी विपक्षी दलों पर बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि वे श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह का ‘रेजीम चेन्ज’ भारत में चाहते हैं। यह आरोप लगाते समय संघियों का ज्यादा जोर हिंसा पर होता है। पर संघी बात को इस बिन्दु पर नहीं जाने देना चाहते कि इन देशों में सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा की जरूरत क्यों पड़ी? आज इन तीनों ही देशों में चुनावों के जरिये नयी सरकारें कायम हैं। इन सरकारों के बारे में किसी की चाहे जो भी अच्छी-बुरी राय हो, इस पर मतभेद नहीं हो सकता कि ये चुनाव के जरिये सत्ता में आई हैं तथा वे पहले की पूंजीवादी व्यवस्था को ही चला रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि फिर बदला क्या? साथ ही यह सवाल उठता है कि यदि व्यवस्था परिवर्तन नहीं हुआ तो सरकार बदलने के लिए हिंसा की जरूरत क्यों पड़ी? क्यों हिंसक विरोध प्रदर्शनों के जरिये सरकारों को खदेड़ा गया?
इसका उत्तर यह है कि श्रीलंका और बांग्लादेश दोनों देशों में सत्ताधारी ऊपरी तौर पर चुनावी व्यवस्था को बनाये रखते हुए भी असल में तानाशाही पर उतर आये थे। नेपाल में ऐसा नहीं था पर वहां कुर्सी दौड़ इतनी भ्रष्ट और वीभत्स हो गयी थी कि लोग स्थापित पार्टियों से आजिज आ गये थे। ऐसे में अपनी जिन्दगी की बदहाली से परेशान लोगों को चुनावों के जरिये सरकार परिवर्तन में कोई समाधान नहीं दिखता था। इस स्थिति में जन आक्रोश सड़क पर फूटना ही था और वह फूटा। जन आक्रोश के इस विस्फोट से सरकारें धराशाई हो गयीं।
यहां एक बार फिर यह रेखांकित करना होगा कि इन तीनों देशों मेें तबाह-बरबाद जनता को चुनाव के जरिये सरकार परिवर्तन की या तो उम्मीद नहीं थी या फिर इसमें कोई विकल्प नहीं दीखता था। इसीलिए संचित होता जन-आक्रोश हिंसक ढंग से फूट पड़ा। पर इसका अंतिम परिणाम महज सत्ता परिवर्तन हुआ, व्यवस्था परिवर्तन नहीं। व्यवस्था में पहले से मौजूद नेता या पार्टियां सत्ता में आ गये। स्वयं-स्फूर्त विस्फोटों का यही परिणाम हो सकता था।
संघ के हिन्दू फासीवादियों को श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल का भूत यूं ही नहीं सता रहा है। वे भयभीत हैं कि यहां भी हालात उन देशों की तरह हो सकते हैं। और उनका भयभीत होना स्वाभाविक है। भारत में भी लोगों की पहले से तबाहहाल जिन्दगी बद से बदतर होती जा रही है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी सब बढ़ रहे हैं। जिन्दगीी मेें बेहतरी की कोई उम्मीद नहीं है। उल्टे नाउम्मीदी ज्यादा है।
पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है।
भारत के हिन्दू फासीवादियों ने 2014 में सत्ता में आने के बाद पूंजीवादी व्यवस्था के इसी ‘सेफ्टी वाल्ब’ को बंद करने का फैसला किया। अपनी ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परियोजना को परवान चढ़ाने के लिए उन्हें यह करना भी था। सत्ता से बाहर होकर तो वे ‘हिन्दू राष्ट्र’ नहीं बना सकते थे। इसीलिए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि यदि वे 2019 का चुनाव जीत गये तो अगले पचास साल तक सत्ता में बने रहेंगे।
देश के बड़े पूंजीपतियों ने इन हिन्दू फासीवादियों को सत्ता में पहुंचाया था। अब इस सरकार ने इन पूंजीपतियों पर जो धन-सम्पदा लुटानी शुरू की उससे देश की मजदूर-मेहनतकश जनता की गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी में भयंकर बढ़ोत्तरी होनी ही थी। लगातार तबाही-बरबादी की शिकार मजदूर-मेहनतकश जनता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि इस सरकार को फिर-फिर चुन ले। 2019 से पहले ही यह साफ होने लगा था। ऐसे में सत्ता में बने रहने के लिए संघियों के पास एक ही रास्ता था- साम, दाम, दंड, भेद हर चीज का इस्तेमाल। और उन्होंने यह करना शुरू कर दिया। राज्य सत्ता के हर हिस्से पर कब्जा इसमें प्रमुख था। इसी के साथ चुनावी व्यवस्था को भ्रष्ट कर उस पर कब्जा भी जरूरी था।
पूरे तंत्र पर कब्जा और उसका अपने लिए इस्तेमाल उनके दोहरे उद्देश्य की पूर्ति करता था। यह उन्हें सत्ता में बने रहने में मदद करता था। यह साथ ही उन्हें उनके ‘हिन्दू राष्ट्र’ के निर्माण में भी मदद करता था। पिछले बारह सालों में उन्होंने इस दिशा में काफी प्रगति की है। इसी प्रगति का नतीजा है कि उन्होंने 2014 के पहले के ‘रेजीम’ को काफी ‘चेन्ज’ कर लिया है। इस तरह असल में हिन्दू फासीवादियों ने पिछले बारह सालों में एक आंशिक ‘रेजीम चेन्ज’ किया है और वे पूर्ण ‘रेजीम चेन्ज’ की ओर बढ़़ना चाहते हैं। वे पूंजीवादी जनतंत्र को खत्म कर फासीवादी ‘हिन्दू राष्ट्र’ कायम करना चाहते हैं। पूंजीवाद के भीतर यह वास्तव में ‘रेजीम चेन्ज’ होगा।
ठीक इसीलिए वे सत्ता से अपनी बेदखली को सरकार बदलने के रूप में नहीं लेते। वे इसे ‘रेजीम चेन्ज’ के रूप में लेते हैं। उन्होंने पिछले बारह सालों में जो ‘रेजीम’ बनाया है वह खतरे में दीख रहा है। वे आश्वस्त थे कि चुनावों के जरिये उन्हें सत्ता से बाहर नहीं किया जा सकता। उन्होंने तंत्र पर जो कब्जा कर लिया था, उससे वे आश्वस्त थे। इसे और मुकम्मल बनाने के लिए वे विशेष गहन पुनरीक्षण, परिसीमन तथा ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की तिकड़ी का मंसूबा पाले हुए थे। लेकिन पिछले तीन महीनों के जन-आंदोलनों ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। यही नहीं, उन्हें अपनी सत्ता के जाने का भय सताने लगा।
उपरोक्त सब से यह सहज ही समझा जा सकता है कि उन्हें यह भय क्यों लग रहा है कि उन्हें श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह हिंसा से सत्ता से हटा दिया जायेगा। उन्होंने स्वयं ही चुनाव के जरिये सरकार बदलने का रास्ता बंद करना चाहा था। वे किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहते थे। ऐसे में आक्रोशित जन के पास क्या रास्ता बचता?
हिन्दू फासीवादियों को ‘रेजीम चेन्ज’ का भय अमूर्त नहीं है और न ही यह बस विरोधियों पर आरोप का मामला है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि उन्होंने तबाह-हाल जनता के सामने कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। देश की राजधानी में पचासों हजार सुरक्षा बलों की तैनाती यूं ही नहीं है। बस अब सीधे-सीधे सेना लगाना बाकी है।
अतः जब सत्ताधारी हिन्दू फासीवादी विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों पर श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल की तरह का ‘रेजीम चेन्ज’ की कोशिश का आरोप लगाते हैं तो यह स्वयं उनकी स्थिति को बयां कर देता है। विपक्षी ऐसा कुछ भी कोशिश नहीं कर रहे हैं। पर हिन्दू फासीवादी जानते हैं कि उन्होंने पूंजीवादी जनतंत्र के खोल के भीतर जो ‘रेजीम चेन्ज’ कर लिया है वह लोगों को उपरोक्त देशों की ओर ले जा सकता है। आखिर तबाह-बरबाद लोगों के पास रास्ता क्या है? हिन्दू फासीवादियों का ‘रेजीम चेन्ज’ का भय एकदम स्वाभाविक है। और इस भय से निपटने का उनका फासीवादी प्रयास भी स्वाभाविक है।
जो उतना स्वाभाविक नहीं है, वह है विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों का व्यवहार। वे मारना भी चाहते हैं और घायल भी नहीं करना चाहते। एक ओर वे कहते हैं कि भाजपा-संघ ने पूरे तंत्र पर कब्जा कर लिया है। कि भाजपा-संघ संविधान बदलना चाहते हैं। संघ परिवार का ‘हिन्दू राष्ट्र’ का घोषित लक्ष्य किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में विपक्षी दलों को खुल कर कहना चाहिए कि वे भाजपा-संघ से लड़ने के लिए किसी भी हद तक जायेंगे। यदि संघी इसे ‘रेजीम चेन्ज’ कहते हैं तो कहें क्योंकि इससे केवल यही साबित होगा कि संघियों ने भारत के संविधान द्वारा प्रस्तावित जनतंत्र के खोल के भीतर अपना कोई विशिष्ट ‘रेजीम’ कायम कर लिया है।
पर विपक्षी दल यह नहीं कह रहे हैं। वे हिन्दू फासीवादियों से खुलकर टकराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। उन्हें ईडी, सी बी आई का तो डर है ही, साथ ही हिन्दू मतदाताओं के छिटक जाने का भी डर है। साथ ही उन्हें अदालतों का भी डर है जिस पर संघियों ने कब्जा कर लिया है।
पूंजीवादी पार्टियां यदि हिन्दू फासीवादियों से ‘रेजीम चेन्ज’ के सवाल पर खुलकर टकराने को तैयार नहीं तो वे कौन सा ‘रेजीम चेन्ज’ कर सकती हैं। बस यही कि किसी तरह जोड़-तोड़ कर सत्ता में आ जायें। इसीलिए वे चुनावी तंत्र पर हर तरह का सवाल उठाने के बावजूद चुनावों के बहिष्कार का नारा नहीं दे रही हैं। वे उम्मीद कर रही हैं कि उनके हो-हल्ले से संघी थोड़ा पीछे हट जायेंगे और ये फिर सत्ता में आ जायेंगे। ऐसे में यह कतई आश्चर्यजनक नहीं है कि वे वर्तमान जन आक्रोश को आगे ले जाने के बदले आगामी विधान सभा चुनावों के जोड़-तोड़ में मशगूल हैं।
जहां तक वास्तविक ‘रेजीम चेन्ज’ यानी स्वयं पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे की बात है वह चुनावी व्यवस्था से संभव नहीं है। चुनावी व्यवस्था में कमी-खामी, शुद्धता-अशुद्धता, इत्यादि सब पूंजीवादी जनतंत्र के दायरे की चीजें हैं। पूंजीवादी जनतंत्र पूंजीवादी व्यवस्था को चलाने का एक तरीका है। फासीवाद, सैनिक तानाशाही, इत्यादि उसके अन्य तरीके हैं। पूंजीवाद के भीतर पूंजीवादी जनतंत्र फासीवाद या सैनिक तानाशाही, इत्यादि से बेहतर है। पर इससे शोषण-उत्पीड़न, गैर-बराबरी, भुखमरी वाली पूंजीवादी व्यवस्था से परे नहीं जाया जा सकता। इसके लिए तो स्वयं पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा ही जरूरी है। असल ‘रेजीम चेन्ज’ तो तभी होगा। यह हिंसक होगा या अहिंसक यह पूर्णतया शासक पूंजीपति वर्ग पर निर्भर करेगा। यह इस पर निर्भर करेगा कि क्या शासक पूंजीपति वर्ग शांतिपूर्ण ढंग से इतिहास के पटल से विदा हो जाने को स्वीकार करेगा?