मुफ्त कोचिंग नहीं हर हाथ को गरिमामयी रोजगार

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
/free-coaching-nahin-har-hath-ko-garimamai-employment

प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से जो भाषण दिया उस पर जंतर-मंतर संघर्ष की स्पष्ट छाप थी। जेन जी को भरमाने के लिए मोदी ने देश के विकास की झूठी गाथा के साथ मुफ्त कोचिंग व दिमागी नक्सल का शिगूफा छोड़ा। 
    
प्रधानमंत्री ने पूरे देश के युवाओं को मुफ्त आनलाइन कोचिंग देने का वायदा किया और बताया कि अब वे बच्चे भी कोचिंग कर पायेंगे जो फीस के अभाव में कोचिंग नहीं कर पाते थे। कि मुफ्त आनलाइन सरकारी कोचिंग से हर छात्र को अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका मिलेगा। कि अब मां-बाप को जमीन गिरवी रख कर या सारी जमा पूंजी खर्च कर बच्चों को कोचिंग भेजने की जरूरत नहीं रहेगी। कि इससे छात्रों का तनाव कम होगा। 
    
बरगलाने में माहिर मोदी ने सोचा था कि मुफ्त कोचिंग के मास्टर स्ट्रोक से वे नयी पीढ़ी को खुश कर देंगे। पर मोदी लगता है कि अपनी ही दूसरी बात भूल गये कि सरकार पर संदेह करने, उससे लड़ने वाले दिमागी नक्सलों से सावधान रहने व उन्हें समाप्त करने की जरूरत है। अब दिमाग से सोचने वाले व सरकार से लड़ने वाला हर व्यक्ति ‘दिमागी नक्सल’ बन गया है तो दरअसल अंधभक्तों को छोड़ आज हर शिक्षित युवा दिमागी नक्सल है; और वह दिमाग से सोचने के चलते मुफ्त कोचिंग के शिगूफे पर नहीं फिसलने वाला। 
    
मुफ्त कोचिंग तो आज सोशल मीडिया-ए आई के दौर में पहले से ही इण्टरनेट पर उपलब्ध होती जा रही है। अगर सरकार भी एक यू ट्यब चैनल बना मुफ्त कोचिंग देने लगे तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? इससे न तो प्राइवेट कोचिंगों का मकड़जाल खत्म होगा और न ही प्रतियोगिता व छात्रों का तनाव जरा भी कम  होगा। न ही इससे पेपर लीक कम होंगे और न ही छात्रों की आत्महत्यायें। 
    
ऐसे में छात्रों का तनाव व प्रतियोगिता मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में खत्म नहीं हो सकती। सबको गरिमामयी रोजगार की गारंटी ही इस प्रतियोगिता व तनाव को कुछ कम कर सकती है। पर हर हाथ को रोजगार केवल पूंजीपतियों पर शिकंजा कस कर व काम के घण्टे घटा कर दिया जा सकता है। पूंजीपतियों के हित में काम करने वाली सरकार यह सब नहीं कर सकती। 
    
इसीलिए मुफ्त कोचिंग के शिगूफे पर अंधभक्त ही जश्न मना सकते हैं। दिमाग रखने वाले युवा तो इस पर अफसोस ही कर सकते हैं कि उनके देश का मुखिया सत्ता की मद में इस कदर मदहोश है कि तुगलकी घोषणाओं से युवाओं को बरगलाना चाहता है। 
    
प्रतियोगिता मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था का सर्वव्यापी लक्षण है। यहां ऊपर चढ़ने की चाह मंे पूंजीपतियों, नेताओं से लेकर छात्र-युवा सब परस्पर प्रतियोगितारत हैं। ऐसे में इस व्यवस्था के अंत के बगैर न तो प्रतियोगिता खत्म होगी और न ही युवाओं का तनाव या आत्महत्यायें। 
    
आज देश के हर कोने में युवा जंतर-मंतर बना रहे हैं। अपने मुद्दों के लिए लड़ रहे हैं। छात्रों-युवाओं को यह समझना होगा कि उनका जीवन पेपर लीक से लेकर स्कूली दुर्दशा में सुधार के संघर्षों को हर हाथ को गरिमामयी रोजगार व शिक्षा व्यवस्था व समाज व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की मांग से जोड़ने से ही बदल सकता है।  

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।