‘नीचे से इतिहास’ और सुमित सरकार

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
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1970 के दशक में आधुनिक भारत के इतिहास लेखन में एक धारा पैदा हुयी जिसने ‘नीचे से इतिहास’ को अपना लक्ष्य बनाया। इसके प्रस्तोता रंजित गुहा थे जो ससेक्स विश्वविद्यालय में अध्यापक थे। 
    
‘नीचे से इतिहास’ की इस धारा के अनुसार अभी तक आधुनिक भारत का इतिहास ऊपर से लिखा गया है यानी ब्रिटिश सरकार की नीतियों-कार्रवाईयों तथा उसके खिलाफ स्थानीय राजे-रजवाड़ों तथा बाद में राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं की नीतियों-कार्रवाईयों के रूप में। आम जनता, खासकर हाशिये की आम जनता (किसान, आदिवासी, इत्यादि) इस इतिहास लेखन से गायब रही है। ज्यादा से ज्यादा उसका जिक्र प्रसंगवश होता रहा है। इस धारा ने इस हाशिये की जनता को आधुनिक भारत के इतिहास लेखन के केन्द्र में लाने का निश्चय किया। 
    
इस धारा में रंजित गुहा के अलावा ज्ञान प्रकाश, दिपेश चक्रवर्ती, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक जैसे भारतीयों के साथ-साथ डेविड हार्डमैन जैसे विदेशी भी जुड़े। इसने अपने शोधपरक लेखों को ‘‘सबआल्टर्न स्टडीज’ नामक संकलन के कई खंड़ों में प्रकाशित किया।
    
इस धारा ने शुरू में खुद को ब्रिटिश माक्र्सवादी इतिहासकार ई वी थाम्पसन का अनुयाई बताया जिनकी किताब ‘मेकिंग आव इंगलिश वर्किंग क्लास’ (अंग्रेजी मजदूर वर्ग का निर्माण) ‘नीचे से इतिहास’ का आदर्श मानी जाती है। पर जल्दी ही यह धारा दूसरी ओर मुड़ गयी। शोषित-उत्पीड़ित वर्गों-तबकों पर माक्र्सवादी नजर से ध्यान देने के बदले यह उस वर्गेतर नजर का शिकार हो गई जो 1980-90 के दशक में उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-उपनिवेशवाद इत्यादि नाम से काफी फैशन में थी। अंत में वह ‘हाशिये के लोगों’ के पिछड़ेपन और पोंगापंथ का जश्न मनाने लगी। जैसा कि कई लोगों ने इंगित किया है, ‘हाशिये के लोगों’ के पिछड़ेपन और पोंगापंथ का यह जश्न तथा माक्र्सवाद व वामपंथ की प्रगतिशीलता का नकार देश में हिन्दू फासीवादियों के विचारों के प्रचार-प्रसार में सहायक साबित हुआ। इस तरह इतिहास लेखन में अभिजात दृष्टि का विरोध करते-करते ये वहां पहुंच गये जहां वे संघी किस्म के अभिजातों के सुर में सुर मिलाने लगे। ‘पश्चिम वाले भारत को नहीं समझते’ बदले हुए रूप में इनका भी मंत्र बन गया- ‘पश्चिमी (मतलब मार्क्सवादी) दृष्टि से गैर-पश्चिमी समाजों को नहीं समझा जा सकता’। यह ‘ओरियेन्टलिज्म’ यानी प्राच्यवाद का नया संस्करण था। 
    
मजे की बात यह है कि ये भारतीय इतिहासकार पश्चिम के विश्वविद्यालयों में बैठकर और पश्चिमी दुनिया की ऐश करते हुए यह कर रहे थे। वे स्वयं पश्चिमी दुनिया की ऐश कर रहे थे जबकि जश्न पिछड़े एशियाई समाजों के पिछड़़ेपन और पोंगापंथ का मना रहे थे। रंजित गुहा ने तो यहां तक कह दिया था कि उनकी तरह का गैर-पश्चिमी देश में पैदा हुआ तथा पश्चिम में रह रहा इतिहासकार ही सही इतिहास लेखन कर सकता है। जिसे कहते हैं- सारी अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में। 
    
सुमित सरकार को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने शुरू में ‘नीचे से इतिहास’ की इस धारा के गैर-माक्र्सवादी मोड़ से खुद को अलग कर लिया। वे आजीवन माक्र्सवादी बने रहे। उन्होंने सत्तासी साल के अपने लम्बे जीवन काल में इसी नजर से भारतीय समाज की ऐतिहासिक गति को देखा। शायद उसका कारण यह हो कि माक्र्सवाद उन्हें घुट्टी में मिला था। उनके पिता तत्कालीन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे और स्वयं प्रतिष्ठित इतिहासकार थे। 
    
सुमित सरकार की 1982 में प्रकाशित किताब आधुनिक भारत (1885-1947) इस विषय पर आज भी सबसे अच्छी किताब है जो इस काल के भारत की ऐतिहासिक गति का समग्र चित्रण करती है। इसमें ‘ऊपर से इतिहास’ को कुशलता के साथ ‘नीचे से इतिहास’ से मिलाया गया है। यह तब तक के आधुनिक भारत पर हुए शोधों का समेकन भी करती है। 
    
इस किताब के अलावा भी सुमित सरकार ने आधुनिक भारत के इतिहास पर काफी काम किया। खासकर ‘राइटिंग सोशल हिस्ट्री’ संकलन में प्रकाशित उनके लेख काफी अच्छे हैं। 
    
बीते 13 अगस्त को सुमित सरकार का सत्तासी साल की उम्र में निधन हो गया। आधुनिक भारत के इस कुशल माक्र्सवादी इतिहासकार को भावभीनी श्रद्धांजलि!

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