उद्योग की बदलती परिभाषा

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
/udhyog-ki-badalati-defination

    
20 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय बेंच ने 6-3 के बहुमत से एक ऐसा निर्णय दिया जिससे संगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारी एक झटके में श्रमिक अधिकारों से वंचित कर दिये गये।
    
दरअसल 1978 में न्यायमूर्ति वी एस अय्यर की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एण्ड सीवेज बोर्ड वर्सेज राजप्पा’ मामले में सुनवाई करते हुए उद्योग की परिभाषा स्वीकृत की थी। सात जजों की बेंच ने अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, सरकारी उपक्रमों, नगरपालिका आदि को उद्योग के दायरे में माना था। केवल न्यायपालिका, रक्षा क्षेत्र व कानून व्यवस्था को उद्योग के दायरे से बाहर रखा गया था। तब न्यायालय ने एक परीक्षण प्रक्रिया भी तय की थी जिसके तहत नियोक्ता और कर्मचारी के सहयोग से वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन या निर्माण से जुड़ी हर व्यवस्थित गतिविधि को उद्योग का दर्जा दे दिया गया था। 
    
1978 की उद्योग की परिभाषा 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम से भी मेल खाती है जिसमें हर उस गतिविधि को जो इंसानी जरूरतें पूरी करने के लिए व्यवस्थित तौर पर नियोक्ता व कर्मचारी द्वारा की जाती है को उद्योग का दर्जा दिया गया था। पर व्यवहार में लम्बे वक्त तक तमाम सेवा क्षेत्र के उद्यम आदि उद्योग के दायरे से बाहर माने जाते रहे। 1978 में सर्वोच्च न्यायालय की बेंच के निर्णय के बाद ही तमाम गतिविधियां उद्योग मानी गयीं। 
    
उद्योग माने जाने से कर्मचारियों को संगठित होने, सामूहिक सौदेबाजी, यूनियन बनाने व श्रम विभाग की शरण लेने व औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत आने का हक मिल जाता रहा है। हालांकि 1978 के उक्त निर्णय को व्यवहार में बेहद कम ही उतारा गया और शिक्षा-व्यवस्था से लेकर बैंक-बीमा आदि क्षेत्रों को आधे-अधूरे अधिकार ही मिले।
    
90 के दशक में जब भारत सरकार ने उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की ओर कदम बढ़ाये तो इसी के साथ मजदूर वर्ग पर हमला भी तेज कर दिया गया। क्रमशः श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव होने लगे और जिसको निर्णायक स्तर पर पहुंचाने का काम मोदी सरकार की 4 मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं ने किया। इन श्रम संहिताओं ने 1978 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को रद्दी की टोकरी में डालते हुए उद्योग की परिभाषा में बदलाव कर दिया।
    
औद्योगिक सम्बन्ध संहिता-2020 ने उद्योग को परिभाषित करते हुए धर्मार्थ-सेवार्थ या परोपकार के उद्देश्य में लगे संस्थानों को उद्योग की परिभाषा से बाहर कर दिया। यानी अब अस्पताल, स्कूल, कालेज, मंदिर के ट्रस्ट, आश्रम जो अक्सर अपने नाम के आगे सेवा भाव लगाये रखते हैं, उद्योग के दायरे से बाहर हो गये। इसी तरह अगर स्कूलों-कालेजों, अस्पतालों में कोई कार्य चाहे वह कितना ही नियमित हो, धर्म या सेवा के बैनर तले हो रहा हो तो उसमें लगे कर्मचारी उद्योग के श्रमिकों के समान सुविधा के हकदार नहीं रहेंगे।
    
जब हाल में ही ये श्रम संहितायें लागू हो गयीं तो 1978 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय व नयी श्रम संहिता की परिभाषा आमने-सामने आने लगी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकायें लगीं जिन्होंने मांग की कि उद्योग की परिभाषा को 1978 के निर्णय से मुक्त कर दिया जाये। या 1978 का निर्णय बदल दिया जाये।
    
अब चूंकि 1978 का निर्णय 7 सदस्यीय सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने दिया था अतः इससे बड़ी बेंच ही इस निर्णय को पलट सकती थी। अब मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय बेंच बनायी गयी। इस बेंच ने 6-3 के बहुमत से निर्णय दिया कि उद्योग की परिभाषा को 1947 के कानून और 1978 के निर्णय से नहीं बांधना चाहिए। अज की प्रतियोगिता वाली दुनिया में उद्योग के भविष्य तरक्की व विकास के लिए 1947 के नियमों की बाधा हटा देनी चाहिए। यानी बहुमत ने नयी श्रम संहिता को उद्योग की व्याख्या को मान्यता दे दी। जबकि अल्पमत के 3 जजों ने इस बदलाव की जरूरत से इंकार करते हुए कहा कि नये बदलावों से निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के हकों को छीना जायेगा व इससे लोगों में असुरक्षा बढ़ेगी जो औद्योगिक अशांति पैदा करेगी। अल्पमत ने 1978 की परिभाषा की जरूरत मजदूरों के हकों की रक्षा के लिए पहले से ज्यादा बतायी। 
    
अब सर्वोच्च न्यायालय निर्णय सुना चुका है और एक झटके में सेवा क्षेत्र के ढेरों संस्थाओं के कर्मियों को श्रम अधिकारों से वंचित कर चुका है। न्यायालय ने अपने इस निर्णय से दिखा दिया कि मजदूर विरोधी रुख में वह सरकारों से कहीं से भी पीछे नहीं है। 
    
उद्योग के दायरे से बाहर किये जाने वाले अधिकतर मजदूर-कर्मचारी संगठित नहीं हैं इसीलिए इस बदलाव का कोई व्यापक विरोध सड़कों पर नहीं दिखा। वैसे भी जब ज्यादातर श्रम अधिकार व्यवहार में माने जाने बंद हो चुके हों तो श्रम और पूंजी का जमीनी संघर्ष ही निर्णायक हो जाता है। और इस जमीनी संघर्ष करने से कोई न्यायालय या कानून मजदूरों को नहीं रोक सकता। मजदूर वर्ग भविष्य में अपने संघर्षों से न केवल श्रम अधिकार फिर से हासिल करेगा बल्कि अपना राज भी कायम करेगा। 

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।