ग्रामीण मजदूरों का प्रदर्शन

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
/grameen-majadooron-ka-pradarshan

रसड़ा (बलिया)/ 24 अगस्त को रसड़ा तहसील मुख्यालय पर ग्रामीण मजदूर यूनियन द्वारा ग्रामीण मजदूरों की विभिन्न मांगों को लेकर जुलूस निकाला गया। जुलूस कई रास्तों से गुजरते हुए लगभग 2 किलोमीटर की दूरी तय करने के पश्चात रसड़ा तहसील पहुंचा जहां प्रदर्शन के पश्चात जनसभा का आयोजन किया गया। 
    
जनसभा में वक्ताओं ने उपस्थित ग्रामीण मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा कि ग्रामीण मजदूरों की जायज मांगों को मौजूदा सरकार नहीं मान रही है। असलियत यह है कि मौजूदा सरकार के साथ-साथ तमाम विपक्षी पार्टियां बड़े पूंजीपतियों के फायदे के लिए काम कर रही हैं और मजदूर किसानों के हित में काम नहीं कर रही हैं। ग्रामीण मजदूरों के हित के लिए काम करने के बजाय उन्हें जाति-धर्म-क्षेत्र के नाम पर बांटने का काम कर रही हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण मजदूरों को अपनी जायज मांगों को मनवाने के लिए खुद को एकजुट करना होगा और इस लड़ाई को जुझारू तरीके से लड़कर जीतना होगा। आने वाले दिनों में बड़े पूंजीपतियों टाटा, बिरला, अंबानी, अडाणी के हित में नित नई योजनाएं बनाई जाएंगी। ग्रामीण मजदूरों को भाजपा-कांग्रेस-सपा-बसपा आदि बड़े पूंजीपतियों के हित में काम करने वाली पार्टियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। ये पार्टियां मजदूरों, किसानों पर हमलावर बीजेपी की सरकार के खिलाफ संघर्ष में नहीं उतरेंगी। इसलिए मजदूरों को इन सभी पूंजीपरस्त पार्टियों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ते हुए अपनी लड़ाई को मजबूत करना होगा और अपनी मांगों को मनवाने के लिए खुद पर भरोसा करते हुए लड़ाई को और जुझारू तरीके से लड़ना होगा।
    
वक्ताओं ने ग्रामीण मजदूरों की दुर्दशा पर बात करते हुए कहा कि मनरेगा की जगह आई जी राम जी योजना में मजदूरों को पहले से भी कम काम मिल रहा है। मजदूरों को वेतन भुगतान में भी देरी की जा रही है। मजदूरों को खेती में भी पहले से कम काम मिल रहा है। खेती में मशीनीकरण के चलते मजदूरों की मांग घट गयी है। निर्माण-भट्टा आदि में काम करने वाले मजदूर भी काफी दिन बगैर काम पाये घर लौटने को मजबूर होते हैं। 
    
सरकार-प्रशासन की बेरुखी बयां करते हुए वक्ताओं ने बताया कि सरकार असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण के ढेरों दावे करती है पर वास्तव में आम देहाती मजदूर का कोई भला नहीं होता। गांवों में न उन्हें प्रधानमंत्री आवास में कोई प्राथमिकता मिलती है और न ही उज्जवला योजना में। प्रधान अपने चहेतों को ही सारी सुविधायें लुटाते रहते हैं। यह सब स्थानीय प्रशासन की जानकारी में होता रहता है। 
    
वक्ताओं ने कहा कि आज जब संगठित मजदूरों के अधिकारों को छीना जा रहा है तो असंगठित ग्रामीण मजदूरों के हालात और बदतर हो रहे हैं। सरकारें समूचे मजदूर वर्ग पर हमलावर हैं ऐसे में समस्त मजदूर वर्ग को न सिर्फ एकजुट होना होगा बल्कि धर्म-जाति की राजनीति को दरकिनार कर अपने हितों की लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा।
    
सभा-जुलूस में कमसड़ी, ईनामीपुर, बहादुरपुर व अन्य गांवों के मजदूरों ने भागीदारी की। क्रांतिकारी गीतों-नारों के साथ मजदूरों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ प्रदर्शन हुआ।             -बलिया संवाददाता 

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।