क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन में हमेशा एक प्रवृत्ति रही है जो मजदूर वर्ग के लिए जनवाद के महत्व को नकारती रही है। इसका कहना है कि पूंजीवाद में मजदूर वर्ग के लिए जनवाद संभव नहीं है और समाजवाद में इसकी आवश्यकता नहीं होगी। इसे सबसे मुखर रूप में राष्ट्रीयता के सवाल के मामले में व्यक्त किया गया। कहा गया कि साम्राज्यवाद के युग में राष्ट्रीय मुक्ति संभव नहीं है और समाजवाद में सभी देशों में मजदूरों के राज के चलते इसकी जरूरत नहीं होगी।
यह गलत प्रवृत्ति पूंजीवाद की एक सच्चाई को अपना प्रस्थान बिन्दु बनाती थी और फिर इससे गलत निष्कर्ष निकालती थी। पूंजीवाद निजी सम्पत्ति की व्यवस्था है। यह निजी सम्पत्ति पूंजी के रूप में होती है। पूंजीवाद में किसी भी व्यक्ति की हैसियत इसी पूंजी की मात्रा से तय होती है। न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक-सामाजिक हैसियत भी इससे तय होती है। अब मजदूर, मजदूर होने के चलते ही पूंजी से वंचित होता है। यदि वह अपनी मजदूरी से बचत कर कुछ पैसा इकट्ठा कर भी लेता है तो भी वह पैसा गाढ़े समय में काम आने के लिए होता है। वह पूंजी नहीं बन जाता। यदि कोई मजदूर बचत के पैसे से पूंजीपति बनने का प्रयास करता है तो अपने कटु अनुभव से उसे समझ में आ जाता है कि मजदूर पूंजीपति नहीं बन सकता।
मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।
पूंजीपति-मजदूर संबंधों से इतर निजी सम्पत्ति की व्यवस्था होने के चलते तथा पूंजी के मुनाफे को ही सब कुछ मानने के चलते पूंजीपति वर्ग हर तरह की जोर-जबरदस्ती, छल-छद्म तथा झूठ-फरेब में लिप्त होता है। सम्पत्तिवान तथा शासक वर्ग होने के चलते इस सबसे उसकी कोई सीमा नहीं होती। पूंजीवाद का समूचा इतिहास इसका गवाह है। साम्राज्यवाद के युग में यह सब और बढ़ जाता है क्योंकि एकाधिकारी प्रवृत्ति के चलते पूंजीपतियों की सब कुछ पर कब्जा कर लेने की चाहत बहुत बढ़ जाती है।
उपरोक्त सारी बातें पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच या देशों के बीच बराबरी को निरस्त करती हैं। और बिना बराबरी के कोई जनवाद नहीं हो सकता। बराबरी और आजादी जनवाद का आधार हैं बल्कि जनवाद का मतलब ही है लोगों की परस्पर आजादी और बराबरी। परस्पर बराबरी और आजादी के आधार पर दो लोग या कई लोग जिन संबंधों में बंधेंगे वे जनवादी संबंध होंगे। लेकिन पूंजीवादी समाज में पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति इस आधार को खंडित करती है। वह लोगों के बीच बराबरी और आजादी की संभावना को खंडित करती है। इससे स्वाभाविक निष्कर्ष निकलता है कि पूंजीवाद में जनवाद नहीं हो सकता क्योंकि इस समाज में उसका आधार गायब है। इससे यह भी स्वाभाविक निष्कर्ष निकलता है कि समाजवाद में इसकी जरूरत नहीं होगी क्योंकि वहां लोगों या देशों के लिए परस्पर सहयोग ही प्रमुख होगा। वहां किसी व्यक्ति या देश के अधिकारों पर जोर देने की क्या जरूरत होगी?
पूंजीवादी समाज में जनवाद के आधार को पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति भले ही खंडित करती हो, वह साथ ही उसकी आवश्यकता को भी समाज के सामने पेश करती है। पूंजीवाद खरीद-बेच की व्यवस्था है। इसमें हर चीज माल होती है। पूंजीपति वर्ग माल के रूप में चीजों के उत्पादन तथा उनकी बिक्री से ही मुनाफा कमाता है। इस खरीद-बेच में बाजार में सारे क्रेता-विक्रेता बराबर होते हैं। इसीलिए बाजार में प्रतियोगिता भी होती है।
माल, मुद्रा, मुनाफा, खरीद-बेच, बाजार, प्रतियोगिता इत्यादि की पूंजीवादी व्यवस्था यह मांग करती है कि कानून की निगाह में सारे आजाद और बराबर हों क्योंकि ऐसे लोग ही बाजार में बराबरी से खरीद-बेच और प्रतियोगिता कर सकते हैं। यदि श्रमिक किसी का भूदास या बंधुआ मजदूर होगा तो वह स्वतंत्र रूप में बाजार भाव पर पूंजीपति को अपनी श्रम शक्ति नहीं बेच पायेगा। इसी तरह यदि पूंजीपतियों पर राजाओं या सामंतों का शिकंजा होगा तो वे आजादी से पूंजी निवेश और खरीद-बेच नहीं कर पायेंगे। इसीलिए सामंती व्यवस्था के भीतर पैदा होने वाला पूंजीपति वर्ग सामंती बंधनों के खिलाफ आजादी व बराबरी का नारा बुलंद करता है। सामंतवाद भांति-भांति की औपचारिक गैर-बराबरी की व्यवस्था होती है। उसमें पैदाइशी गैर-बराबरी होती है- वंश, नस्ल, लिंग, धर्म, वर्ग इत्यादि सभी आधार पर। इस पैदाइशी गैर-बराबरी को बनाये रखने के लिए भांति-भांति के बंधन भी होते हैं। नया उभरता पूंजीपति वर्ग इन सामंती बंधनों को तोड़कर आजादी व बराबरी की मांग करता है। महान फ्रांसीसी क्रांति के ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के नारे का यही आधार था।
पूंजी के कारोबार से पैदा होने वाला आजादी और बराबरी का यह नारा, व्यवहार में तुरंत ही केवल पूंजीपति वर्ग की आजादी व बराबरी के रूप में प्रकट हो जाता है। न केवल निजी सम्पत्ति की गैर-बराबरी वाले समाज में सबको बराबरी नहीं मिल सकती, बल्कि पूंजीपति अपने मुनाफे व मुनाफे की व्यवस्था के लिए सबकी बराबरी को खतरनाक भी समझते हैं। इसीलिए वे इस आजादी व बराबरी को केवल अपने तक सीमित रखना चाहते हैं। वे जनवाद को केवल अपने तक सीमित रखना चाहते हैं। इतिहास में वास्तव में यही हुआ। एक लम्बे समय तक जनवाद केवल पूंजीपति वर्ग तक या थोड़े से सम्पत्तिवान लोगों तक सीमित रहा। आबादी के हिसाब से बात करें तो पांच प्रतिशत से भी कम।
लेकिन पूंजीवाद की गति और स्वयं पूंजीपति वर्ग की बातें आजादी और बराबरी की भावना को मजदूर वर्ग तथा अन्य मेहनतकश जनता तक प्रसारित कर रही थीं। मजदूर-मेहनतकश जनता भी सामंती बंधनों से मुक्ति चाहती थी। वह पैदाइशी गैर-बराबरी का खात्मा चाहती थी। इतना ही नहीं, वह समाज के संचालन में भी अपनी हिस्सेदारी चाहती थी। यहीं से पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक सारे संबंधों में आजादी व बराबरी की मांग मजदूर-मेहनतकश जनता में जोर पकड़ने लगी। जहां पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग के लिए आजादी व बराबरी को केवल बाजार में खरीद-बेच तक सीमित रखना चाहता था, वहीं मजदूर वर्ग इसे सारे सामाजिक संबंधों तक विस्तारित करना चाहता था।
पूंजीवादी क्रांतियों से लेकर अभी तक का पूंजीवाद का सारा इतिहास मजदूर वर्ग (तथा अन्य मेहनतकश जनता) द्वारा अपने लिए आजादी व बराबरी को पहले कानूनी तथा फिर वास्तव में हासिल करने के संघर्ष का इतिहास है। यह साथ ही पूंजीपति वर्ग द्वारा इसका प्रतिरोध करने तथा मजबूरी में पीछे हटने का भी इतिहास है। केवल बीसवीं सदी में जाकर ही मजदूर-मेहनतकश जनता को सारे जनवादी अधिकार कानूनी तौर पर हासिल हो सके (कुछ समाजों में तो यह अभी भी नहीं हो सका है)। जहां तक इन्हें वास्तव में हासिल करने का सवाल है, वह न्यूनतम ही हो पाया है। निजी सम्पत्ति की पूंजीवादी व्यवस्था के रहते इससे ज्यादा हो भी नहीं सकता। इसीलिए इस संबंध में यह कहा गया हैः ‘जनवाद का सारा सवाल उन अधिकारों की घोषणा और पूर्ति में है, पूंजीवाद में जिनकी पूर्ति न्यून से न्यून ही हो सकती है’। मजदूर वर्ग के लिए यही सही क्रांतिकारी अवस्थिति है।
यहां से मजदूर आंदोलन में उस गलत प्रवृत्ति को समझा जा सकता है जो जनवाद के सवाल को खारिज कर देती है। चूंकि पूंजी की निजी सम्पत्ति की व्यवस्था में मजदूर वर्ग को वास्तव में जनवाद हासिल नहीं हो सकता, इसलिए जनवादी सवालों की चिंता क्यों? मजदूर वर्ग को तो सीधे समाजवाद की ही बात करनी चाहिए।
इस संबंध में दो बातें जरूरी हैं।
एक तो यह कि जनवादी अधिकारों का अभाव मजदूर वर्ग में यह भ्रम पैदा करता है कि पूंजीवाद में उसकी सारी समस्याओं की जड़ में अधिकारों का अभाव है। ऐसे में उसका सारा ध्यान अधिकारों के अभाव पर केन्द्रित रहता है। वह समस्या की असली जड़ यानी पूंजी के संबंध की ओर जा ही नहीं पाता। एक बार कानूनी तौर पर अधिकारों की प्राप्ति के बाद ही उसके लिए स्पष्ट होना शुरू होता है कि उसकी समस्याओं की जड़ में अधिकारों का अभाव नहीं बल्कि पूंजी है। कि पूंजी के रहते उसके कानूनी अधिकारों का कोई मतलब नहीं होता। कि पूंजी के रहते उसे वास्तव में आजादी और बराबरी हासिल नहीं हो सकती। कि उसके शोषण का खात्मा केवल पूंजी के खात्मे से ही हो सकता है। कि उसकी उजरती गुलामी से मुक्ति पूंजी व श्रम के वर्तमान संबंधों के खात्मे के बिना नहीं हो सकती।
दूसरी बात यह कि मजदूर वर्ग को जिस भविष्य के साम्यवादी समाज में जाना है वहां वह जनवाद की बीच मंजिल को तय किये बिना नहीं पहुंच सकता। साम्यवाद बहुत उच्च चेतना वाला स्वतः प्रबंधित समाज होगा। उस समाज के सारे ही लोग उस चेतना पर होंगे जहां सबकी आजादी और बराबरी उनकी सहज चेतना में होगी तथा उसे व्यवहार में लागू करने में निजी सम्पत्ति की कोई बाधा भी नहीं होगी। इसीलिए बराबरी और आजादी निजी सम्पत्ति विहीन साम्यवादी समाज में ही वास्तव में संभव हो पायेगी।
लेकिन यहां तक भांति-भांति के पैदाइशी बंधनों में जीने वाले लोग, जिन्हें अपने अधिकारों की कोई चेतना नहीं होती, वे नहीं पहुंच सकते। यहां तक केवल वही पहुंच सकते हैं जिन्हें अपने व दूसरों के अधिकारों की पूर्ण चेतना हो तथा जिनके लिए स्पष्ट हो कि इन अधिकारों की व्यवहार में पूर्ति के रास्ते में निजी सम्पत्ति बाधा है। यही बात पूरे समाज के स्तर पर भी लागू होती है। अधिकार विहीनता की स्थिति में रचे-बसे लोगों को ढोकर साम्यवाद में नहीं पहुंचाया जा सकता। यहां तक कि इनसे उसके पहले के समाजवादी समाज का भी निर्माण नहीं हो सकता। इसीलिए सामंती या अर्द्ध-सामंती समाजों के लिए पहले जनवादी क्रांति की बात की जाती है। केवल इनसे गुजर कर ही समाज अगली मंजिल में जा सकता है।
मजदूर वर्ग के लिए जनवाद का सवाल एक अन्य दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। पूंजीपति वर्ग को बोलने की आजादी, सभा-जुलूस की आजादी, संगठित होने की आजादी, इत्यादि की कोई खास जरूरत नहीं होती। इन सबकी भरपाई वह आसानी से अपनी पूंजी से कर लेता है। वैसे भी वह पूंजीवाद में शासक होता है। उसे सभा-जुलूस, इत्यादि की क्या जरूरत? इनकी जरूरत तो मजदूर वर्ग को पड़ती है। मजदूर वर्ग इनके अभाव में भी क्रांति कर लेगा। पर इन जनवादी अधिकारों की मौजूदगी उसके लिए काफी सहूलियत पैदा कर देती है। इसीलिए मजदूर वर्ग इन अधिकारों के लिए लड़ता है और उसे लड़ना चाहिए। अन्यथा वह पूंजीपति वर्ग द्वारा अधिकारविहीन मजदूरों की स्थिति में धकेल दिया जायेगा।
पिछले तीन-चार सौ सालों में मजदूर वर्ग ने पूंजीपति वर्ग से संघर्ष कर जिन जनवादी अधिकारों को क्रमशः हासिल किया है, पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के चैतरफा संकट की इस घड़ी में अपनी रक्षा के लिए इन्हें छीनने पर आमादा है। सारे ही देशों में शासक, पूंजीपति वर्ग की निरंकुशता बढ़ रही है। नागरिकों पर राज्य सत्ता का शिकंजा कस रहा है। पूंजीपति वर्ग फासीवादियों को शह दे रहा है। दुनिया में एक बार फिर फासीवादी निजामों का खतरा पैदा हो गया है।
ऐसे में मजदूर वर्ग जनवाद के सवालों से अन्यमनस्क नहीं रह सकता। वह पूंजीपति वर्ग द्वारा जनवाद के हनन को चुपचाप होने नहीं दे सकता। क्योंकि! इसकी सबसे ज्यादा कीमत उसे ही चुकानी होगी। इसीलिए मजदूर वर्ग को पूंजीपति वर्ग द्वारा जनवाद के हनन के हर कदम का पुरजोर विरोध करना चाहिए।
हां, यह विरोध करते समय यह स्पष्ट रहना चाहिए कि यह सड़ी-गली पूंजीवादी व्यवस्था ही है जो पूंजीपति वर्ग को अपनी रक्षा में जनवाद के हनन की ओर ले जा रही है। इसीलिए जनवाद के हनन का विरोध करते समय लक्ष्य पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने का नहीं होना चाहिए। इसके बदले इस सड़ी-गली व्यवस्था का चैतरफा भंडाफोड़ कर इस व्यवस्था से परे जाने की जरूरत को रेखांकित करना चाहिए।