मनुस्मृति के विरोध पर गिरफ्तारी

/manusmrati-ke-virodha-par-giraftari

देश की संसद में गृहमंत्री द्वारा अम्बेडकर के अपमान का मुद्दा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि वाराणसी में घटे एक घटनाक्रम ने दिखला दिया कि दरअसल संघ-भाजपा को अम्बेडकर से न केवल कुछ लेना देना नहीं है बल्कि ये अम्बेडकर विरोधी हैं। 
    
25 दिसम्बर 1927 को अम्बेडकर ने मनुस्मृति का दहन कर जातीय उत्पीड़न के इस ग्रन्थ से अपना विरोध व्यक्त किया था। अम्बेडकर के इस कृत्य की याद में बी.एच.यू. वाराणसी में भगत सिंह स्टूडेंट््स मोर्चा ने मनु स्मृति पर चर्चा व इसके प्रतीकात्मक दहन का कार्यक्रम रखा। 
    
पर सत्ता के मद में चूर संघ-भाजपा के साथ बी एच यू प्रशासन को यह बात नागवार गुजरी कि कोई मनुस्मृति के विरोध में कार्यक्रम करे। मनु स्मृति संघ-भाजपा के दिल में बसती है वे इसी पर आधारित हिंदू राष्ट्र कायम करना चाहते हैं। जाति व्यवस्था की क्रूरतम रूप में ये वापसी चाहते हैं। ऐसे में मनुस्मृति का विरोध करने वालों को ये सबक सिखाने को तत्पर हो गये। अम्बेडकर का नाम लेना इनकी वक्ती मजबूरी है अन्यथा अम्बेडकर को लात लगा मनुस्मृति को सिर पर धारण करने में इन्हें देर नहीं लगेगी। 
    
छात्रों के इस कार्यक्रम को रोकने विश्वविद्यालय सुरक्षाकर्मी व स्थानीय पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गयी। उसने छात्रों से अभद्रता की व 3 छात्राओं सहित 13 छात्रों को गिरफ्तार कर लंका थाने ले आयी। लंका थाने को अपनी जागीर मानने वाले एस एच ओ की कृपा से छात्रों को अपने वकील से भी नहीं मिलने दिया गया। 
    
अगले दिन गंभीर धाराओं में (जिसमें 10 वर्ष तक की सजा तक का प्रावधान है) मुकदमा कायम कर इन छात्रों को जेल भेज दिया गया। 
    
गौरतलब है कि ब्रिटिश राज में जब अम्बेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था तब ब्रिटिश हुकूमत ने अम्बेडकर पर कोई कार्यवाही नहीं की थी। इस मामले में संघी हुकूमत ब्रिटिश हुकूमत से अधिक क्रूर व्यवहार पर उतरी हुई है। छात्रों पर बी एन एस की 132, 121(2), 196, 299, 110, 191(1), 115 (2) धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। ये धारायें सरकारी कर्मचारी पर हमला, उसे गंभीर चोट पहुंचाने, शांति भंग, धार्मिक चीज का अपमान, गैर इरादतन हत्या का प्रयास व दंगे से जुड़ी है। 
    
अपने इस कृत्य से सरकार ने दिखा दिया है कि मनुस्मृति उसका पुण्य ग्रंथ है और जाति व्यवस्था उसके हिंदू राष्ट्र का अहम तत्व है। ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता बोध यह पूरे समाज पर थोपना चाहती है। 
    
छात्रों की इस गिरफ्तारी का जगह-जगह से विरोध शुरू हो गया है। साथ ही बी एच यू गार्डों व थाना प्रभारी पर कार्यवाही की मांग जोर पकड़ रही है।  

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।