छात्रवृत्तियों के लिए बजट नहीं, परीक्षा पर चर्चा के लिए लिमिट नहीं
2018 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ करना शुरू किया। एक दिन के इस कार्यक्रम में (2018 में) 3.67 करोड़ रुपए खर्च हुए। 2025 तक यह खर्च 5 गुना से ज्यादा बढ़
2018 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ करना शुरू किया। एक दिन के इस कार्यक्रम में (2018 में) 3.67 करोड़ रुपए खर्च हुए। 2025 तक यह खर्च 5 गुना से ज्यादा बढ़
अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को अपना प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं। वे इसके लिए दुनिया भर में व्यूह रचना कर रहे हैं। चीन की बढ़ती आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक ताकत ने पुराने व
14 जून, 2025 को लाखों लोगों ने अमेरिका में 2,000 से अधिक स्थानों और 50 राज्यों में से प्रत्येक में ट्रम्प प्रशासन की दक्षिणपंथी नीतियों और तानाशाही तरीकों के खिलाफ विरोध
पिछले दिनों उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश भर से अतिक्रमण हटाने के नाम पर जंगलों, गांव, खत्तों, बस्तियों के लोगों को आतंकित किया। जिसके खिलाफ लोगों के आंदोलनों-प्रदर्शनों के ब
लम्बे समय से ईरान के ऊपर हमले की तैयारी में लगे जियनवादी फासीवादी, इजरायली शासकों ने सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए 13 जून को उस पर भीषण हमला बोल दिया था। इस
हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के करीब 5 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों को मर्ज (विलय) करने की तैयारी कर दी है। कहीं-कहीं यह संख्या 27 हजार के आस-प
मजदूर वर्ग आबादी में भारत का सबसे बड़ा वर्ग है। पर भारत की राजनीति में इसके मुद्दे इसकी मांगें इसकी भारी आबादी के सापेक्ष कहीं नजर नहीं आते। धर्म-जाति-क्षेत्र के मुद्दे कह
आर जी कर मेडिकल कालेज कलकत्ता में रेजिडेंट डाक्टर से सामूहिक बलात्कार-हत्या के मामले को एक वर्ष भी नहीं बीता था कि कलकत्ता के एक लॉ कालेज में एक कानून की छात्रा के साथ सा
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।