पेपर लीक और संघ-भाजपा
नीट परीक्षा पर छात्रों-युवाओं के बढ़ते आक्रोश ने इसे देशव्यापी बहस का मसला बना दिया है। लाखों छात्रों के भविष्य से हुए खिलवाड़ की आंच देश की संसद से लेकर सड़क तक हर ओर दिखाई
नीट परीक्षा पर छात्रों-युवाओं के बढ़ते आक्रोश ने इसे देशव्यापी बहस का मसला बना दिया है। लाखों छात्रों के भविष्य से हुए खिलवाड़ की आंच देश की संसद से लेकर सड़क तक हर ओर दिखाई
आजकल मैं गावों में हूं और यहां का नजारा देख रहा हूं
साथियो, दिनांक 23 जून 2024 को पद्विनी वी एन एन (PADVINI VNA) सेक्टर 35 गुरुग्राम नरसिंहपुर में अचानक मजदूरों का जुझारू आंदोलन सुबह लगभग सुबह 8ः30 बजे शुरू होता है। यह आंद
उत्तर प्रदेश के जिला बरेली में परसा खेडा क्षेत्र है। यह फैक्टरी एरिया है। यहां लगभग 200 से 250 फैक्टरी होंगी। इसी क्षेत्र में रोड न.
देश को नयी सरकार मिल चुकी है। वैसे नयी सरकार में नया क्या है। प्रधानमंत्री वही, वही रक्षामंत्री, वही गृहमंत्री, वही वित्त मंत्री, वही विदेश मंत्री। कृषि मंत्री जरूर नये ह
देश में औद्योगिक क्षेत्रों में लग रही आग का सिलसिला रुक नहीं रहा है। इसी कड़ी में गुड़गांव में दौलताबाद इंडस्ट्रियल एरिया में फायर एंड पर्सनल सेफ्टी इंटरप्राइजेज़ में आग लग
बरेली/ लगातार बढ़ती बेरोजगारी नौजवानों को निराशा व पस्तहिम्मती में ढकेल रही है। बरेली शहर में इसी तरह के बेरोजगार घर, मकान, जेवर गिरवी रखकर कर्ज लेकर आटो
भाजपा 2024 लोकसभा चुनाव में बहुमत से नीचे क्या आयी, संघ की मानो जान में जान आ गयी। मोदी-शाह के आगे मातृ संगठन की दोयम होती जा रही स्थिति से मानो संघ को उबरने का मौका मिल
1994 के सत्ता हस्तांतरण के बाद भी श्वेत पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों की लूट पूर्ववत जारी रही। संघर्ष के सालों में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस, सुधारवादी दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन फेडरेशन कोसाटु का त्रिपक्षीय गठबंधन जो बना था वह सत्तासीन होने के बाद जारी रहा। लम्बे संघर्ष के दौरान जो व्यापक जन समर्थन मिला था, वह सत्ता में आने के बाद भी जारी रहा। 1999 के चुनाव में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को 70 प्रतिशत मत मिले थे।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।