विविध

महान सर्वहारा नेता लेनिन

महान समाजवादी अक्टूबर क्रांति के नेता लेनिन की मृत्यु 21 जनवरी 1924 को हुई थी। उनकी मृत्यु को 100 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। बीते 100 वर्षों के इतिहास पर महान अक्टूबर समा

संसद में धुंआ

13 दिसम्बर को देश की संसद में कुछ नौजवान छापामार तरीके से घुस गये। उन्होंने जूते में छिपी सामग्री से संसद में रंगीन धुंआ उड़ाया और नारे लगाने लगे। संसद के बाहर भी कुछ नौजव

कनाडा : सार्वजनिक क्षेत्र के लाखों कर्मचारी हड़ताल पर

8 दिसम्बर से कनाडा के क्यूबेक प्रांत के लाखों कर्मचारी एक सप्ताह की हड़ताल पर हैं। इनमें अध्यापक, स्वास्थ्य क्षेत्र के कर्मचारी के अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मच

महिलाओं के साथ बढ़ती हिंसा

2023 दिसंबर की शुरुआत में एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) की ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट जारी हुई है। ये रिपोर्ट हर साल जारी की जाती है। हर साल महिलाओं के खिलाफ बढ़त

बाघ और तेंदुये के आतंक से निजात दिलाने को जनता संघर्षरत

रामनगर (नैनीताल) में कार्बेट से लगे गांवों में बाघ और तेंदुये के आतंक और कार्बेट प्रशासन व सरकार द्वारा इंसानों के बजाय जंगली जानवरों की जान को अधिक अहमियत देने के कारण ग

वैश्विक निवेशक समिट और मोदी

2002 के गुजरात दंगों के आयोजन के बाद गुजरात के तब के मुख्यमंत्री रहे मोदी ने 2003 में वाइब्रेंट गुजरात का आयोजन करवाया था। यह ग्लोबल इन्वेस्टर्स सम्मेलन था जिसमें देशी और

आई एम पी सी एल, मोहान के निजीकरण के विरोध में संघर्ष

रामनगर/ भारत सरकार की मिनी रत्न का दर्जा प्राप्त और मुनाफे में चल रही आयुर्वेदिक दवा कंपनी- आई एम पी सी एल, मोहान के निजीकरण की कोशिशों के विरोध में 8 दि

प्रदूषण, पराली, सरकार व न्यायपालिका

किसानों द्वारा पराली (धान की फसल का पुआल जो हारवेस्टर से कटाई के बाद खेतों में पड़ा रहता है) जलाने पर न्यायालय के आदेश के तहत सरकारों द्वारा कठोर कार्यवाही की जा रही है। क

ब्रिटानिया के ठेका मजदूरों का संघर्ष

रुद्रपुर (उत्तराखंड) स्थित ब्रिटानिया कंपनी में 30 नवंबर 2023 को दोपहर 1ः00 से लगभग 1800-2000 मजदूरों ने काम बंद कर दिया और वेतन बढ़ोतरी और महीने में पूरी ड्यूटी देने समेत

पूंजीवादी जनतंत्र में ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव

उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में पूंजीपति वर्ग ने ‘इतिहास के अंत’ में ‘उदार पूंजीवादी जनतंत्र की अंतिम विजय’ के बाद काफी प्रगति की है। उसने अब पूंजीवादी जनतंत्र को महज ‘स्वत

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।