विविध

फासीवादी जुल्म के शिकार परिचालक ने की आत्महत्या

बरेली/ तीन महीने पूर्व दिनांक 3 जून 2023 को बरेली डिपो की जनरथ बस न्च् 32 छछ 0330  बरेली सेटेलाइट बस स्टैण्ड से दिल्ली के कौशाम्बी बस स्टैंड के लिए रवाना

योगी राज में बढ़ता जातीय उत्पीड़न

बरेली/ बरेली जिले की फरीदपुर तहसील के गांव पिपरथरा में दिनांक 11 जुलाई को दलित समुदाय के एक गरीब परिवार के व्यक्ति सचिन दिवाकर की गांव की ही ठाकुर बिरादरी के दबंग युवकों के द्वारा

का. नगेन्द्र स्मृति वार्षिक सेमिनार

हर वर्ष की भांति इस वर्ष 8 अक्टूबर 2023 को नागरिक ‘पाक्षिक’ वार्षिक सेमिनार का आयोजन कर रहा है। इस वर्ष यह सेमिनार बरनाला (पंजाब) में आयोजित किया जा रहा है। सेमिनार का विषय आम चुनाव, बढ़ता फासीवादी

जी-20 शिखर सम्मेलन के विरोध में विभिन्न जगह प्रदर्शन

9-10 सितम्बर को देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित जी-20 के शिखर सम्मेलन के विरोध में विभिन्न जगहों पर मजदूर, छात्र, महिला एवं जनवादी व सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन आयोजित क

बेलसोनिका मजदूरों का जी-20 के विरोध में पैदल मार्च

गुड़गांव/ दिनांक 9 सितंबर 2023 को बेलसोनिका यूनियन ने मारुति सुजूकी फैक्टरी मानेसर के गेट नंबर 4 से सुबह 10ः00 बजे जी-20 के सम्मेलन स्थल तक अपना तय कार्यक

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था एक आइना : बी.एच.यू. के संदर्भ से

वाराणसी/ उत्तर भारत के अस्पतालों में बनारस स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मेडिकल संस्थान का एक प्रमुख स्थान है। जिसका पूरा नाम प्ण्डण्ैण् ठण्भ्ण्न्ण्

इतिहास में एक छोटा सा सबक

देश में आजकल हिन्दू फासीवादियों की मेहरबानी से देश के इतिहास पर काफी बात हो रही है। कभी देश के नाम पर बात तो कभी देश की गुलामी की बात। आम तौर पर इतिहास की जरा भी कद्र न करने वाले लोग भी इस मामले मे

मोदी राज में उजड़ती दुनिया

देश में जब से फासीवादी मोदी सरकार आई, पूरे देश में डर, भय, आतंक का माहौल बना हुआ है। किस राज्य में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता है। फिलहाल मणिपुर राज्य में पूरी तरह से

भारत एक निगरानी राज्य और आधार की भूमिका

आज जब देश की जनता अपने जीवन के हर मोड़ पर सरकार के द्वारा जांची-परखी, दर्ज और पंजीकृत की जा रही है तो भारत पूरी तरह से एक निगरानी राज्य में तब्दील हो चुका है। चेहरे की पहच

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।