2003 बनाम 2025 का यूरोप

/2003-banam-2025-ka-europe

ईरान पर अमरीकी हमले के बाद यूरोप के प्रमुख देशों की प्रतिक्रिया ने यूरोपीय साम्राज्यवादियों की वर्तमान स्थिति को बहुत मुखर ढंग से उजागर कर दिया। इसने दिखाया कि वे अमरीकी साम्राज्यवादियों के पिछलग्गू बन चुके हैं। जो स्थिति पहले ब्रिटेन की थी वही अब फ्रांस और जर्मनी की होने लगी है। 
    
22 जून को ईरान पर अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा बिना किसी उकसावे के हमले के बाद यूके, फ्रांस और जर्मनी ने न केवल इस हमले की निंदा नहीं की बल्कि एक तरह से उसे जायज ठहराया। उन्होंने आधिकारिक तौर पर जो बयान दिया उससे यह ध्वनित हुआ है कि ईरान पर अमरीकी हमले के लिए खुद ईरान जिम्मेदार है। उन्होंने बिना किसी सबूत के ईरान पर परमाणु समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया और कहा कि उसे परमाणु बम बनाने नहीं दिया जा सकता। उन्होंने ईरान से समझौता वार्ता में आने को कहा जबकि ईरान वार्ता से कभी बाहर गया ही नहीं था। कुल मिलाकर उन्होंने अमरीकी साम्राज्यवादियों का साथ दिया। 
    
उनका यह व्यवहार 2003 के उनके व्यवहार से एकदम भिन्न है। तब फ्रांस और जर्मनी इराक पर अमरीकी हमले के खिलाफ थे। उस समय अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इराक पर हमला करने के लिए इसी तरह के झूठे आरोप लगाए थे। उन्होंने महीनों तक इसका प्रचार किया था। पर दुनिया इस झूठ को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। तब 15 फरवरी 2003 को दुनिया भर में एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने इराक पर संभावित हमले का सड़क पर उतर कर विरोध किया था। 
    
उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फ्रांस के प्रतिनिधि ने अमरीकी झूठ की पोल खोली थी। इसी तरह रूसी प्रतिनिधि ने भी झूठ की पोल खोली। इन सब वजहों से अमरीकी साम्राज्यवादी एकदम अलग-थलग पड़ गए थे। केवल यूके उनके साथ था।
    
अंततः जब मार्च 2003 में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इराक पर हमला किया तो उनकी यह नंगी हरकत सबके लिए साफ थी। वे किसी झूठ के झीने पर्दे के पीछे छिप नहीं सकते थे। इसी वजह से तब अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ‘पुराने यूरोप’ व ‘नये यूरोप’ का राग अलापा। पूर्वी यूरोप के कुछ देशों ने इस हमले में अमरीकी साम्राज्यवादियों का साथ दिया था इसलिए वे उन्हें ‘नया यूरोप’ कह रहे थे। इसके बरक्स ‘फ्रांस-जर्मनी’ के नेतृत्व में ‘पुराना यूरोप’ था जो अमरीकी साम्राज्यवादियों की इस उद्धत कार्रवाई में साथ नहीं दे रहा था। वह अंतर्राष्ट्रीय कानून इत्यादि का हवाला दे रहा था। 
    
अब 2025 में लगता है वह ‘पुराना यूरोप’ भी ‘नया’ हो गया है। अब फ्रांस व जर्मनी भी यूके की तरह अमरीकी साम्राज्यवादियों के पीछे चलने लगे हैं। अन्यथा वे ईरान पर अमरीकी हमले का यूं समर्थन नहीं करते। 
    
फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ का यहां पहुंचना अचानक नहीं हुआ है। यूक्रेन युद्ध और वर्तमान पश्चिम एशिया की स्थिति ने बस हकीकत को उजागर कर दिया। 
    
जब सदी की शुरुआत में यूरोपीय संघ अस्तित्व में आया तब ऐसा लगा कि वह सामूहिक तौर पर अमेरिका को चुनौती दे सकता है। उसकी अर्थव्यवस्था अमरीका के आस-पास ही थी। इसका नेतृत्व करने वाले फ्रांस व जर्मनी ऐसा सोचते भी थे।
    
पर समय ने दिखाया कि ऐसा नहीं हुआ। यूरोपीय संघ की औपचारिक एकता वास्तविक एकता में नहीं बदल सकी। इतना ही नहीं यूके तो इससे बाहर ही हो गया। 2007-8 के संकट और उसके बाद इसके और भी गहरे प्रभाव ने यूरोपीय संघ के लिए स्थिति और विकट कर दी। रही-सही कसर रूस और चीन के उभार ने पूरी कर दी।
    
पिछले दस साल यूरोपीय संघ के लिए उसकी घटती औकात के साल रहे हैं। यह याद रखना होगा कि चीन का आर्थिक उभार अमरीकी की कीमत पर नहीं हो रहा है बल्कि यूरोप व जापान की कीमत पर हो रहा है। एक अलग देश के तौर पर यूके, फ्रांस और जर्मनी सभी पीछे जा रहे हैं जबकि समूह के तौर पर यूरोपीय संघ संकटग्रस्त है।
    
यूक्रेन और पश्चिम एशिया दोनों जगह यूरोप की प्रमुख शक्तियों और यूरोपीय संघ का अमरीकी साम्राज्यवादियों का पिछलग्गू बनना इसी का परिणाम है। वे खुश हों या ना हों पर फिलहाल वे यही कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं।
 

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।