अरे! तुमने तो वामपंथ की लाज बचा ली

क्या कमाल हो गया है। विचित्र है किन्तु  सत्य है। इलेक्टोरल बाण्ड में हमारे सरकारी वामपंथी एकदम पाकसाफ होकर निकले हैं। एक भी रुपये का बाण्ड हमारे सरकारी वामपंथियों के नाम नहीं निकला। सीपीआई (एम) ने तो उलटे इलेक्टोरल बाण्ड के काले धंधे के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में शिकायत ही दर्ज करवाई थी। उसके ही प्रयासों का प्रताप है कि इलेक्टोरल बाण्ड के धंधे का पर्दाफाश हो गया। हम्माम में सब नंगे निकले एक हमारे सरकारी वामपंथी ही थे जो हम्माम में कपड़े पहने हुए थे। कपड़ा पहना हुआ आदमी ही हम्माम में सारे नंगों की हकीकत बतला सकता था। शाबाश! सरकारी वामपंथियों! आपने अपना जीवन सार्थक कर दिया। आपके नाम के साथ जो वामपंथ जुड़ा है उसकी तुमने लाज रख ली। बधाई हो! 
    
अपनी लाज बचाने के इस मुबारक मौके पर बस यही बात याद दिलाने का मन करता है कि काश तुमने क्रांति की, विचारधारा की लाज बचाने के लिए भी कुछ किया होता। मजदूरों-मेहनतकशों के प्रति वही निष्ठा दिखाई होती जो तुमने पूंजीवादी लोकतंत्र की परवाह करते हुए दिखायी है। 
    
इलेक्टोरल बाण्ड के नाम पर तुम भले ही पाकदामन निकले हो पर अन्य मामलों में तो तुम्हारा दामन दागों से भरा हुआ है। बंगाल से लेकर केरल तक कई इस बात की गवाही दे देंगे कि इस वामपंथ का दामन कितने-कितने दागों से भरा पड़ा है। 
    
खैर! एक बात बतायेंगे कि आप हम्माम में गये क्यों थे। 

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।