बस और ट्रेन का सफर

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50

ट्रेन या बस में सफर करते हुए हमें एक उलझन सी रहती है। ट्रेन में सफर के लिए स्टेशन पर इंतजार करते हुए यह पता नहीं होता है कि ट्रेन कब आयेगी। बस में बैठकर इंतजार करते हुए सोचते रहो कि बस कब चलेगी। कभी-कभी बस के ड्राइवर या कंडक्टर से पूछ लो कि बस कब चलेगी। लेकिन ट्रेन के लिए यह सुविधा नहीं है। अनिश्चितता कभी भी अच्छी नहीं होती है। ईरान-अमेरिका की जंग कब रुकेगी या महंगाई का क्या होगा, यह कहां तक बढ़ेगी आदि। निश्चित चीजें ज्यादा सही होती हैं। जैसे बंगाल के चुनाव में कौन जीतेगा, इसमें कोई अनिश्चितता नहीं थी कि बंगाल का चुनाव भारतीय जनता पार्टी जीतेगी। जीत निश्चित होती है तो तैयारी का मजा ही और होता है। और वैसे भी विकास का स्वाद तो सभी को चााहिए। आखिर कब तक बंगाली माछ-भात खाते रहेंगे, कभी तो ढोकला खाना ही था। बंगाल के लोगों ने दाल-भात के साथ ढोकला का स्वाद चख लिया। 
    
बस में सफर करते हुए अक्सर सड़कों पर बोर्ड आते हैं कि यह फलानी जगह है लेकिन कुछ पता नहीं चलता। दिल्ली में सफर करते हुए एक बोर्ड आता है कि धौलाकुआं। बहुत सालों से उस जगह से निकलने के बाद भी या वहां पर उतरने के बाद भी कहीं दिखता नहीं कि धौलाकुआं कहां है। आज कल कुएं तो होते नहीं तो बस में बैठे अन्दाजा लगाया जा सकता है वहां पर बहुत पहले कोई कुआं होता होगा जिसके नाम पर इसका नाम पड़ा होगा। वहां पर खड़े होने बाद भी कुछ लगता नहीं कि धौलाकुआं और दूसरी जगह में क्या फर्क है। दिल्ली की बसों में सफर के लिए जो सवाल पहले था और आज भी मन में रहता है कि सीट मिलेगी कि नहीं। कितने फ्लाईओवर बन गये, डीजल बसों की बजाय सीएनजी बसें चलीं, फिर लो फ्लोर बसें चलीं, और अब इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं। लेकिन जो सवाल पच्चीस साल पहले था और आज भी है कि सीट मिलेगी कि नहीं। मैट्रो चलने के बाद भी यही हालत है कि एक हाथ बन्दर के जैसे लटक कर ही सफर करना है। यह हाथ जीत के बाद विक्टरी साइन बनाने के लिए नहीं उठता और न ही फेमस गुरू के आशीर्वाद जैसे।
    
सफर करते-करते कोई कहीं पहुंच जाता है तो कोई कहीं। बंगाली और बिहारी जाते हैं दिल्ली और गुजरात काम करने और गुजराती लोग वहां पहुंच रहे हैं विकास करने। बंगाल से शुरू हुआ अंग्रेजों का शासन आज गुजरातियों के कब्जे में है। सिर्फ इंसान ही बस में सफर तो नहीं करता, ईवीएम मशीनें भी सफर करती हैं। क्या मशीनों को भी इतनी तकलीफ होती होगी जितनी इंसानों को होती है लेकिन मशीनें कभी शिकायत नहीं करतीं। वैसे इंसान भी मशीन बन गया है तो शिकायत क्या करेगा। शिकायत करेगा भी तो किससे, पूर्ण बहुमत की मजबूत सरकारें हैं। सफर बस का हो या जिंदगी का आज के समय में सूफी शायर ख्वाजा मीर दर्द का यह शेर सही नहीं बैठता- ‘‘सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगी गर रही तो ये जवानी फिर कहां’’ और न ही यह सही बैठता है ‘‘जिंदगी एक सफर है सुहाना’’। हमारा सफर और जिंदगी का सफर दोनों हुक्मरानों के कैद में है।             -खबीस, फरीदाबाद
 

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।