बिहार में दबंगों ने दलितों के 80 घर फूंके

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बिहार के नवादा जिले के मुफस्सील थाना क्षेत्र के कृष्णानगर अनुसूचित टोले में 18 सितम्बर को दबंगों ने फायरिंग की और पूरे टोले के 80 घरों को आग लगा दी। यह टोला थाने से बस 2 किलोमीटर की दूरी पर है। इस घटना से जहाँ दबंगों के होंसले कितने बड़े हुए हैं, यह पता चलता है वहीं दूसरी और दलितों की शोचनीय स्थिति का पता चलता है।

दरअसल दबंगों और दलितों के बीच जमीन को लेकर विवाद था। विवाद की जमीन पर दलितों का कब्ज़ा था। इसी विवाद की वजह से दबंगों ने 80 घरों को फूंक कर सैकड़ों लोगों को बेघर कर दिया। यह घटना शाम की है जब महिलाएं घरों में खाना बना रही थीं। इस घटना में किसी के मरने की खबर नहीं है।

बिहार में इस समय नितीश बाबू की सरकार है जिसमें भाजपा का इंजिन लगा हुआ है। नितीश बाबू महादलितों की बात तो करते हैं लेकिन इस घटना ने जहाँ उनकी पोल खोल दी है वहीं दलितों के मसीहा बनने वाले चिराग पासवान आदि भी पर सवाल उठने लगे हैं। ये लोग दलितों के वोट हासिल कर सत्ता की मलाई चाटने के लिए घोर दलित विरोधी संघ और भाजपा के पिछलग्गू बने हुए हैं।

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।