घोषित आपातकाल (इंदिरा गांधी) बनाम अघोषित आपातकाल (मोदी)

आगामी 26 जून को देश में आपातकाल को लगे हुए 50वां साल शुरू हो जायेगा। 26 जून 1975 को ही इंदिरा गांधी ने संविधान में इमरजेंसी के प्रावधान के तहत देश में आपातकाल लगा जनता के जनवादी अधिकारों को छीन लिया था। इस आपातकाल के दौरान आजाद भारत में मजदूर-मेहनतकश जनता पर जुल्म की एक नई दास्तां लिखी गयी थी।

आज हम भारत में फिर से देख रहे हैं कि किस तरह जनता के जनवादी अधिकारों का हनन किया जा रहा है। आज से 10 साल पहले जब से देश में संघ-भाजपा की सरकार बनी है तब से यह प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी है। आज सरकार की आलोचना करना ही देशद्रोह हो गया है। लोगों को सालों-साल तक बिना मुकदमा चलाये संगीन धाराओं में जेल में ठूंसा जा रहा है। उनकी जमानतें तक नहीं हो रही हैं।

इंदिरा गांधी ने तो घोषित तौर पर आपातकाल लगाया था परन्तु भारत में पिछले 10 साल से अघोषित आपातकाल लागू है। इंदिरा गांधी को तो देश की जनता ने चुनावों में हराकर उनको सबक सिखाया था लेकिन अब जनता चुनाव के जरिये इस अघोषित आपातकाल से नहीं निबट सकती। अभी हाल में हुए आम चुनाव में जिस तरह भाजपा सरकार ने शासन-प्रशासन की मशीनरी का दुरूपयोग किया। चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भाजपा सरकार को जिताने में लगे रहे, उससे साबित होता है कि अब यह फासीवादी किस स्थिति में पहुंच गये हैं।

मौजूदा समय में संघ-भाजपा द्वारा भारत में लागू अघोषित आपातकाल और इंदिरा गांधी द्वारा लागू घोषित आपातकाल को समझने के लिए नागरिक के लेखों की पी डी एफ का लिंक दिया जा रहा है। इसे पढ़ने के लिए नीचे दिये लिंक पर क्लिक कर डाउनलोड करें -

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आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।