केन्या के स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल जारी है

केन्या के 7000 स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल 13 मार्च से जारी है। इन स्वास्थ्य कर्मचारियों में डाक्टर, इंटर्न, लेब टेक्नीशियन आदि शामिल हैं। यह हड़ताल केन्या मेडिकल प्रोफेसनल्स एंड डेंटिस्ट यूनियन के बैनर तले हो रही है। इनकी 19 सूत्रीय मांगें हैं जिनमें वेतन बढ़ाने और काम की बुरी परिस्थितियों को लेकर मांगें प्रमुख हैं। 
    
ताज़ा जानकारी के अनुसार हड़ताली कर्मचारियों को बर्खास्तगी के पत्र मिलने शुरू हो गये हैं। इनमें नेतृत्व के भी लोग हैं। यह सब सरकार इस सब के बावजूद कर रही कि कोर्ट ने हड़ताली कर्मचारियों के खिलाफ इस तरह की कार्यवाही करने से सरकार को मना किया है। इससे स्पष्ट हो गया है कि सरकार हड़ताली कर्मचारियों की मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं है।
    
दरअसल हड़ताली कर्मचारी 2017 में हुए एक सामूहिक समझौते को लागू न करने के कारण हड़ताल पर गये हैं। 2017 में हुए इस समझौते के अनुसार सरकार डाक्टर और मरीजों के बीच के अनुपात को कम करेगी। यानी नये डाक्टर और इंटर्न को तैयार करेगी और उन्हें शीघ्र ही अस्पतालों में नियुक्त करेगी। लेकिन अब सरकार यह कह रही है कि 2017 में जो सामूहिक समझौता हुआ था वह राजनीतिक दबाव में हुआ था। इसलिए वह इस समझौते को अब लागू नहीं कर सकती।
    
2017 के समझौते के बाद करीब 1000 डाक्टर और इंटर्न तैयार किये गये लेकिन उनको नियुक्त नहीं किया जा रहा है। क्योंकि इनके लिए सरकार पैसा देने को ही तैयार नहीं है। इसके अलावा सरकार इंटर्न को जो वेतन दे रही है उसमें से कटौती करने को तैयार है। अभी इंटर्न को 2,06,000 केन्याई रुपये दे रही है इसको घटाकर वह 70,000 करने की बात कर रही है। यह वेतन 2017 के समय के वेतन से भी कम है। सरकार ऐसा करने के लिए पैसे न होने का रोना रो रही है। 
    
2022 में जब से विलियम रूटो राष्ट्रपति बने हैं तबसे वे लगातार सरकारी खर्च घटाने की कोशिश कर रहे हैं। इस समय केन्या में सरकारी कर्मचारियों पर बजट का मात्र 4.5 प्रतिशत खर्च किया जाता है। जबकि वैश्विक स्तर पर औसत खर्च बजट का 9 प्रतिशत है। इसके बावजूद सरकार बजट में सरकारी कर्मचारियों पर जो खर्च कर रही है उसमें 10 प्रतिशत की कमी करना चाहती है। 
    
सन 2001 में अफ्रीकी देशों की एक बैठक नाइजीरिया के अबूजा शहर में हुई थी। इस बैठक में एच आई वी/एड्स, टी बी, मलेरिया, आदि और अन्य संक्रामक रोगों की रोकथाम हेतु यह तय किया गया था कि सभी देशों की सरकारें अपने बजट का 15 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करेंगी। इसे अबूजा घोषणा कहा गया था। इनमें केन्या भी था। लेकिन इस घोषणा पर कभी अमल नहीं किया गया।
    
इस समय केन्या के सभी 57 सरकारी अस्पतालों के स्वास्थ्य कर्मचारी हड़ताल पर हैं। आम जनता को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। कई गंभीर मरीजों की इस बीच मौत हो चुकी है। और केन्या की सरकार इस सबके लिए हड़ताल कर रहे स्वास्थ्य कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराकर उनके खिलाफ माहौल बनाने का काम कर रही है। लेकिन दरअसल यह केन्याई सरकार ही है जो अपने किये गये समझौते को लागू नहीं कर रही है। आम जनता जो बेहद गरीब है उसका इलाज तभी बेहतर हो सकता है जब अस्पतालों में डाक्टर सहित अन्य संसाधन पर्याप्त मात्रा में हों। 
    
आज अगर स्वास्थ्य कर्मचारी पूरी तरह से हड़ताल पर चले गये हैं उसके पीछे केन्याई सरकार की हठधर्मिता ही है जो 2017 के समझौते को लागू नहीं कर रही है। जब भी सरकार/मालिक और कर्मचारी/मजदूर में समझौता होता है तो दबाव में ही होता है वरना सरकार और मालिक तो चाहते ही हैं कि कर्मचारी और मजदूर कम से कम वेतन और सुविधाओं में काम करते रहें। आज अगर केन्याई जनता स्वास्थ्य सेवाओं के न मिलने से परेशान है तो उसके लिए केन्याई सरकार ही दोषी है। 
    
केन्याई सरकार स्वास्थ्य सेवा के लिए पैसा न होने का बहाना बना रही है। क्योंकि वह निजी क्षेत्र में लगी पूंजी को फायदा पहुँचाना चाहती है। सरकार चाहती है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवा नाम मात्र के रूप में चलती रहें जिससे गरीब लोग सरकारी अस्पतालों में नाम मात्र के इलाज की सुविधा प्राप्त करते रहें। और सरकार की बदनामी भी न हो। 
    
केन्याई सरकार पूंजीपतियों पर कर बढ़ाकर स्वास्थ्य क्षेत्र को बेहतर बनाने की तरफ बढ़ सकती है लेकिन उस पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का भी दबाव है जो पूरी दुनिया में स्वास्थ्य-शिक्षा सहित सभी सेवाओं का निजीकरण करना चाहती हैं। केन्याई स्वास्थ्य कर्मचारियों का संघर्ष अपनी सरकार के साथ-साथ इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से भी है।
 

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।