लम्बा खिंचता युद्ध : बढ़ती दुश्वारियां

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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अमेरिकी-इजरायल हमलावरों द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध को एक माह से अधिक हो चुका है। ट्रम्प-नेतन्याहू का चंद दिनों में ईरान में सत्ता परिवर्तन का ख्वाब धूल धूसरित हो चुका है। अब हालत यह है कि अमेरिकी सरगना ट्रम्प ईरान से वार्ता की बातें करने लगे हैं। इस बीच ईरान द्वारा होरमुज जल डमरूमध्य का रास्ता रोके जाने से दुनिया भर की जनता की दुश्वारियां बढ़ रही हैं। यमन के हूती विद्रोहियों के ईरान के पक्ष में युद्ध में उतर आने से एक और व्यापारिक रास्ते के बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है। 
    
यमन के हूती विद्रोहियों ने इजरायल पर मिसाइलें दाग कर ईरान के पक्ष से युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी है। हूती विद्रोहियों का यमन की राजधानी सना और उत्तर पश्चिमी हिस्से पर नियंत्रण है। इजरायल द्वारा गाजा नरसंहार के वक्त भी हूती विद्रोहियों ने फिलिस्तीनी अवाम के पक्ष में इजरायल पर हमले बोले थे। उसने लाल सागर के दक्षिण छोर पर यमन और हार्न आफ अफ्रीका के बीच स्थित बाब अल-मदेब स्ट्रेट को लगभग बंद कर दिया था और वहां से गुजरने वाले कई जहाजों को डुबा दिया था। अब दोबारा उनके इस रास्ते का जाम करने का खतरा पैदा हो गया है। अगर ऐसा होता है तो होरमुज के बाद इस इलाके का इसका प्रमुख व्यापारिक रास्ता भी जाम हो जायेगा। बाब अल-मदेब स्ट्रेट के जरिये हिंद महासागर से लाल सागर व फिर स्वेज नहर तक जहाज आते जाते हैं। स्वेज नहर एशिया व यूरोप के बीच सबसे तेज समुद्री मार्ग है और तेल व गैस का 15 प्रतिशत वैश्विक व्यापार इस रास्ते से होता रहा है। होरमुज के बंद होने से इस रास्ते पर व्यापार बढ़ गया था। अब इसके बंद होने का खतरा दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को अधिक गम्भीर चुनौती की ओर धकेल सकता है। 
    
युद्ध के लम्बा खिंचने के चलते तेल-गैस के संकट के कई देशों में घनीभूत होने की संभावना है। रूस द्वारा तैयार तेल का निर्यात रोकने की घोषण इस संकट को और गम्भीर बनायेगी। रेटिंग एजेंसी मूडी ने भारत-चीन-जापान की अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर प्रभावित होने और विदेशी मुद्रा भण्डार घटने की संभावना व्यक्त की है। कइ्र देशां को तेल-गैस में राशनिंग करनी पड़ रही है। उनका तेल-गैस का रिजर्व भण्डार खत्म हो रहा है। कई प्राकृतिक गैस से उत्पादन करने वाली कंपनियां ने अपना उत्पादन गिरा दिया है। 
    
तेल-गैस के बाद भारत में खाद खासकर यूरिया का संकट खड़े होने की संभावना जतायी जा रही है। खुद पश्चिम एशिया के देशों में अब हमले तेल-गैस उत्पादक केन्द्रों, खारे पानी को मीठा बनाने वाले संयंत्रों पर होने से वहां भी लोगों का रोजगार-पेयजल प्रभावित हो रहा है। सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर हमले अब नागरिक आबादी पर भी होने लगे हैं। 
    
भारत की बात की जाये तो यहां बीते एक माह से जनता गैस सिलेण्डर के लिए लाइनें लगा रही है। मोदी सरकार कभी दावा कर रही है कि गैस की कोई कमी नहीं है तो कभी उसके मंत्रिगण इस संकट के लिए युद्ध को जिम्मेदार ठहरा मोदी सरकर को बचाने का काम कर रहे हैं। वे यह सच्चाई जनता से छुपाने में जुटे हैं कि मोदी सरकार की अमेरिकापरस्ती के चलते ही ईरान भारतीय जहाजों को होरमुज से गुजरने में रोक-टोक कर रहा है। रुपया डालर के सापेक्ष तेजी से नीचे गिर रहा है। गैस की किल्लत, तेल के दाम बढ़ने की आशंका में महंगाई तेजी से बढ़ रही है। मजदूर मेहनतकश जनता गैस छोड़ चूल्हा फूंकने या फिर 200-300 रुपये किलो गैस खरीदने को मजबूर हो रही है। ढेरों औद्योगिक क्षेत्रों में गैस की किल्लत के चलते मजदूर मजबूरी में गांव की ओर लौट रहे हैं। ऐसे में सरकार कभी सब कुछ चंगा तो कभी कोरोना महामारी सरीखी स्थिति की परस्पर विरोधी बातें कर रही है। आपदा में अवसर तलाशते हुए गैस कम्पनियां-पूंजीपति जनता को और लूट-खसोट अपनी तिजोरियां भर रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी व उनकी पार्टी जनता की तकलीफों से बेपरवाह आगामी विधान सभा चुनावों के मद्देनजर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने में जुटी है। सरकार साम्प्रदायिक उन्माद के सहारे जनता को उसकी बदहाल होती जिन्दगी भुलवाना चाहती है। पर धीरे-धीरे ही सही जनता संघ-भाजपा की असलियत पहचान रही है और वह दिन दूर नहीं जब जनता इनके खिलाफ सड़कों पर होगी। 

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