सवालों से भागता चुनाव आयोग
भारत का चुनाव आयोग आजकल काफी चर्चा में है। एक तरफ बिहार में मतदाता सूची पुनर्रीक्षण पर पहले से ही हल्ला मचा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जारी बिहार की तदर्थ मतदाता सूची में
भारत का चुनाव आयोग आजकल काफी चर्चा में है। एक तरफ बिहार में मतदाता सूची पुनर्रीक्षण पर पहले से ही हल्ला मचा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जारी बिहार की तदर्थ मतदाता सूची में
उ.प्र.-उत्तराखण्ड के कई जिलों में गांवों-शहरों में लोग रात-रात भर जाग रहे हैं। वे इस खौफ में जाग रहे हैं कि कोई ‘द्रोण चोर’ उनके यहां डकैती न डाल दे। लोग हाथों में डण्डे
आम गरीब नागरिकों के घरों और दुकानों को अलग-अलग तर्कों से बुलडोजर के जरिए रौंदने का अभियान जारी है। उत्तर प्रदेश में योगी राज से होता हुआ यह बुलडोजर अभियान अलग-अलग भाजपाई
मोदी सरकार के आगमन के बाद देश में साम्प्रदायिक उन्माद में गुणात्मक बढ़ोत्तरी हुई है। यह साम्प्रदायिकता खासकर मुसलमानों को निशाने पर लेकर हुई है। हालांकि दलित, आदिवासी व मह
भाजपा-संघ का शासन धीरे-धीरे ही सही खुद को अधिकाधिक पूंजीपरस्ती की ओर ले जा रहा है और इसके जरिये अपने मजदूर विरोधी चेहरे को उजागर कर रहा है। एक-एक कर भाजपा सरकारें फैक्टरि
पिछले दिनों मुंबई उच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग मामलों में दोष सिद्ध न होने के कारण आरोपियों को बरी किया। 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों में मुंबई उच्च
बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे बढ़ा रही है। नागरिकता संशोधन कानून के जरिए तीन पड़ोसी देशों के गैर मुसलमानों को भारत की नागरिकता द
दुनिया भर में शासक वर्ग अमानवीय होकर अपने-अपने देश में शरणार्थियों के मुद्दे को उठाए हुए है। शासक वर्ग अपने घृणित राजनीतिक लाभ के लिए शरणार्थियों के नाम पर राजनीति करने स
भारत और ब्रिटेन के बीच हुए ‘मुक्त व्यापार समझौते’ को ऐतिहासिक समझौते की संज्ञा दी जा रही है। निःसंदेह यह समझौता इस मामले में ऐतिहासिक है कि अपने आपको सबसे बड़ा राष्ट्रवादी
बीते दिनों संसद के दोनों सदनों में आपरेशन सिंदूर पर चर्चा हुई। इस चर्चा में विपक्ष द्वारा उठाये गये एक भी सवाल का जवाब देने की मोदी सरकार ने जरूरत नहीं समझी। सवालों के जव
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।