उन्नाव में भीषण बस हादसा, 18 लोगों की मौत

10 जुलाई की सुबह उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे पर एक डबल डेकर बस और दूध से भरे टैंकर की जबरदस्त भिड़ंत में 18 लोगों की मौत हो गई और 19 लोग घायल हो गये। यह बस बिहार के शिवहर से दिल्ली जा रही थी। मरने वालों में मोतिहारी के एक ही परिवार के 6 लोग शामिल हैं।

दुर्घटना की दो वजह सामने आ रही हैं। पहली यह कि बस के ड्राइवर को सुबह के समय झपकी लग गयी होगी या फिर दूसरी यह कि एक्सप्रेस वे पर बरसात के समय कुहरे की वजह से बस के ड्राइवर को सामने जाता ट्रक नहीं दिखाई दिया। भिड़न्त इतनी जबरदस्त थी कि बस बीच से फटती चली गयी। इससे पता चलता है बस बहुत तेज़ गति में रही होगी।

लेकिन साथ ही इस दुर्घटना का एक पहलू और है। और वह है बस का खटारा होना और बिना बीमे और उचित कागजों के सड़क पर चलना। बस का रेजिस्ट्रेशन भी गलत नाम से करवाया गया था। और इस दुर्घटना में मरने वाले लोगों का मज़दूर होना। इसका मतलब साफ है।

दरअसल बिहार से जिस बस में मज़दूरों को दिल्ली लाया जा रहा था, वह बस खटारा थी। इतनी लम्बी दूरी की बसों को उचित रखरखाव और बिना प्रशिक्षित ड्राइवरों के चलाने का मतलब बस में बैठे लोगों की जान के साथ खेलना। और चुंकि ये लोग मज़दूर पृष्ठभूमि से थे इसलिए इनकी जान के साथ आसानी से खेला जा सकता था। ऐसी बसों को टूरिस्ट बसों के नाम पर संचालन किया जाता है क्योंकि ऐसी बसों को अंतर्राज्यीय परमिट नहीं मिलता। जाहिर है बिना परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार के यह संभव नहीं है। ऐसे में बस के मालिक के अलावा परिवहन विभाग के अधिकारी भी इस दुर्घटना के लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं।

लेकिन चुंकि इस दुर्घटना में मारे गये मज़दूर हैं इसलिये 2-2 लाख रुपए देकर मामले को टाल दिया जायेगा। लेकिन इस तरह की लापरवाहियां खत्म करने के बारे में जरा भी नहीं सोचा जाएगा।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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