मोदी की अमेरिकी यात्रा के निहितार्थ
पिछले दिनों देश के प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका की यात्रा पर थे। अमेरिका में मोदी के प्रवास के दौरान वह सब कुछ हुआ जो हो सकता था। स.रा.
पिछले दिनों देश के प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका की यात्रा पर थे। अमेरिका में मोदी के प्रवास के दौरान वह सब कुछ हुआ जो हो सकता था। स.रा.
प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका की राजकीय यात्रा पिछले दिनों काफी चर्चा का मुद्दा रही। भारत के चाटुकार मीडिया ने दिन-रात की कवरेज कर यह साबित करने की कोशिश की कि मोदी एक वैश
अभी बीते 28 मई 2023 को देश की नई संसद सेण्ट्रल विस्टा का उद््घाटन हुआ है। इस उद्घाटन समारोह में सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी व उसके कुछ सहयोगी दलों ने ही हिस्सेदार
मई के महीने में सी एस डी एस-लोकनीति के एक सर्वेक्षण का परिणाम काफी चर्चा में रहा। इस सर्वेक्षण ने दिखाया था कि प्रधानमंत्री पद के लिए जहां नरेन्द्र मोदी 43 प्रतिशत लोगों की पसंद थे वहीं 27 प्रतिशत
हरिद्वार में ‘देवभूमि श्रमिक संगठन हिंदुस्तान यूनिलीवर’ सिडकुल हरिद्वार द्वारा अपने पूरे प्लांट के 1500 मजदूरों के मध्य मजदूर वर्ग की वर्गीय एकता को मजबूत करने के लिए एक पुस्तिका ‘मकड़ा और मक्खी’ का
जून अंत में बिहार के पटना में जी-20 के देशों की ट्रेड यूनियनों की एल-20 (लेबर-20) की बैठक आयोजित हुई। लेकिन इस बैठक की अध्यक्षता आर एस एस के मजदूर संगठन- भारतीय मजदूर संघ
बदायूं जिले के नगला शर्की गांव के किसान रूम सिंह ने 22 जून 2023 को बदायूं की सदर तहसील के नायब तहसीलदार और लेखपाल के उत्पीड़न से तंग आकर सलफास की गोलियां खा लीं। उनकी बरेल
बीते कुछ समय से समूचे उत्तराखण्ड में पुलिस का सत्यापन अभियान चल रहा है। इस सत्यापन अभियान के तहत पुलिस उत्तराखण्ड के बाहर के व्यक्तियों, किरायेदारों, दुकानदारों, फड़-ठेली
हल्द्वानी/ हल्द्वानी (उत्तराखंड) क्षेत्रान्तर्गत कमलुवागांजा में साम्प्रदायिक सौहार्द खराब करने और मुस्लिम अल्पसंख्यकों की दुकानों को जबरन बंद करवाने/खाल
भारत में पत्रकारों पर हमले अब आए दिन की बात बन गए हैं। राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप के हालिया आंकड़े इस बात को और भी स्पष्ट करते हैं। इस ग्रुप ने आंकड़ों को इकट्ठा कर यह
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।