विविध

भारत लोकतंत्र की जननी कैसे है?

बीते कुछ समय से मोदी सरकार ने लोकतंत्र का जाप बढ़ाते हुए भारत को न केवल सबसे बड़ा लोकतंत्र बल्कि लोकतंत्र की जननी कहना शुरू कर दिया तो सभी इतिहासकार अचम्भे में पड़ गये। वैसे

वैज्ञानिक उपलब्धि; श्रेय का चक्कर

चन्द्रयान-3 के चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक पहुंचना और फिर उसके बाद प्रज्ञान रोवर का भी सफलतापूर्वक काम करना निःसंदेह एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है। यह वैज्ञानिक उप

हिंदू फासीवाद के विरुद्ध व्यापक अभियान

देश में लगातार गहरा रहे हिंदू फासीवाद के खतरे के मद्देनजर जुलाई-अगस्त माह में इसके विरोध में एक अभियान संगठित किया गया। यह अभियान इंकलाबी मजदूर केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र

अभियान में प्रशासन द्वारा अवरोध पैदा करने की कोशिश

हल्द्वानी (उत्तराखंड)/ 16 अगस्त की शाम को हल्द्वानी के बनभूलपुरा के इलाके में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और प्रगतिशील महिला ए

ठेका मजदूरों ने संघर्ष के दम पर हासिल किया वेतन

पंतनगर/ दिनांक 24 अगस्त 2023 को जुलाई माह का वेतन भुगतान नहीं होने से गुस्साए गार्डन सैक्सन के ठेका मजदूरों ने सुबह काम बंद कर दिया। मजदूरों ने लम्बित जुलाई माह का वेतन और हर माह क

इंटरार्क मजदूर फिर संघर्ष की राह पर

रुद्रपुर/ विगत वर्ष 2021 एवं वर्ष 2022 में इंटरार्क कंपनी सिडकुल पंतनगर एवं किच्छा जिला उधमसिंह नगर (उत्तराखंड) में कार्यरत मजदूरों का 16 माह लंबा एवं जु

इस साल की बरसात ने किया बुरा हाल

इस साल बरसात के मौसम में काफी तबाही-बरबादी देखने को मिली। पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक बारिश ने काफी कहर बरपा किया। बरसात के पानी में मकान माचिस की डिब्बियों की तरह बहते

सैनिक तख्तापलट के बाद नाइजर - साम्राज्यवादियों के बीच टकराव का एक क्षेत्र

26 जुलाई के सैनिक तख्तापटल के बाद नाइजर में कई तरह ही ताकतें सक्रिय हो गयी हैं। एक तरफ, अमरीकी साम्राज्यवादी, फ्रांस और यूरोपीय संघ है। ये साम्राज्यवादी ताकतें इकोवास (पश

बर्बरता की ओर

जब चेतन सिंह चौधरी ने चलती रेल के अलग-अलग डिब्बों में अपने अधिकारी टीकाराम मीना और तीन मुसलमान यात्रियों की चुन-चुन कर हत्या की तो हिन्दू फासीवादी सरकार और उसके समर्थकों

जिन्दगी और मौत

जिन्दगी और मौत के बीच फासला बहुत कम रह जाता है। यह तब महसूस हुआ जब किसी को केवल मुसलमान होने पर मारा जा सकता है। 31 जुलाई को नूंह में हुई साम्प्रदायिक हिंसा को आधार बनाकर

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।