‘‘..अहो रूपं, अहो ध्वनिः’’

11 सितम्बर को प्रधानमंत्री मोदी के नाम से देश के प्रमुख अखबारों में एक लेख छपा। लेख संघ प्रमुख मोहन भागवत के 75वें जन्मदिवस के मौके पर था। मोदी जी ने मोहन भागवत की प्रशंसा में कसीदे गढ़ दिये। ‘परम पूज्यनीय’, ‘आदरणीय’, ‘पूरा जीवन सतत प्रेरणा देने वाले’, ‘असाधारण व्यक्ति’, ‘व्यक्तिगत शक्ति’, बौद्धिक गहराई’, ‘सहृदय नेतृत्व’, ‘युवाओं से सहज जुड़ाव’, आदि, आदि। 
    
यह सब कुछ बड़ा मजेदार है। मोदी जी के द्वारा मोहन भागवत की प्रशंसा से अनायास ही संस्कृत का एक श्लोक बार-बार याद आ जाता है। श्लोक है,

‘‘उष्ट्राणां विवाहेषु, गींत गायन्ति गर्दभाः।
परस्परं प्रशंसन्ति अहो रूपं अहो ध्वनिः।।’’
    
यानी ऊंटों की शादी में गधे गीत गा रहे हैं। वे एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। गधा कह रहा है ऊंट से क्या तेरा रूप है और ऊंट गधे से कह रहा क्या तेरी आवाज है। 
    
अब यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि ऊंट कुरूपता का तो गधा कर्कश आवाज का प्रतीक है। 
    
खैर! सबसे बड़ी बात तो यह है कि मोदी जी ने यह लेख क्यों लिखा और भागवत जी इसका जवाब क्या 17 सितम्बर को एक लेख लिख कर देंगे। वैसे अंग्र्रेजी में भी एक कहावत है जिसका हिन्दी में अर्थ होगा ‘तुम मेरी पीठ खुजलाओ, मैं तुम्हारी पीठ खुजलाता हूं (यू स्क्रेच माई बेक एण्ड आई विल स्क्रेच यूवर्स)। अब देखना यह है कि भागवत जी मोदी की पीठ खुजलाते हैं कि नहीं। 17 सितम्बर तक आपको इंतजार करना पड़ेगा। या बेचारे मोदी जी की पीठ की खुजली मिटती ही नहीं। वैसे जब भागवत जी ने यह कह दिया कि उन्होंने रिटायर होने की उम्र 75 वर्ष कभी कही नहीं थी तब से सब कुछ साफ हो गया था। दोनों ही महानुभावों में से कोई भी 75 वर्ष पूरे होने पर रिटायर नहीं होने वाला है। कौन जाने इस कारण ही होसबोले जी की तबियत खराब हो गयी हो। और कौन जाने भाजपा में किस-किस की तबीयत अब बिगड़ जाये। 

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।