भारत को अमरीकी धमकी

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पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी जब अपने यार अमरीकी सरगना ट्रम्प से मिलने अमरीका गये तो सारी यारी गायब दिखी। मोदी के मुंह पर ट्रम्प सीमा कर, अप्रवास, ब्रिक्स आदि पर भारत के खिलाफ बोलते रहे और मोदी आज्ञाकारी चाकर की भांति सुनते रहे। इसी वार्ता के बाद पता चला कि भारत अमेरिका से एफ-35 लड़ाकू विमान खरीदेगा। 
    
अब 7 मार्च को नई दिल्ली में इंडिया टुडे कानक्लेव में अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटविक ने भारत को रूस से हथियार खरीदना बंद करने का निर्देश देने के साथ फ्रांस-ब्रिटेन से रक्षा उपकरण खरीदने को मूर्खतापूर्ण करार दिया। उन्होंने अमेरिका से हथियार खरीदने की वकालत की। 
    
मोदी अपने यार ट्रम्प के वाणिज्य सचिव की धमकी पर कोई बयान देने की हिम्मत नहीं करेंगे। उनकी यारी के चलते भारत जबरन एफ-35 खरीदने के अलावा अमेरिका से और न जाने कितना फालतू सामान खरीदेगा। लगता है 56 इंच का सीना देश के भीतर व पड़ोसियों के लिए ही है। अमेरिका के आगे वह 26 इंच का रह जाता है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।