दिल्ली : फ़ूड प्रोसेसिंग फैक्टरी में आग, 3 मज़दूरों की मौत, 6 मज़दूर घायल

8 जून शनिवार को सुबह 3:30 बजे दिल्ली के नरेला इलाके में फ़ूड प्रोसेसिंग कम्पनी श्याम कृपा फ़ूड्स प्राइवेट लिमिटेड में आग लगने से तीन मज़दूरों की मौत हो गयी और 6 मज़दूर घायल हो गये। इस फैक्टरी को दाल मिल के नाम से भी लोग जानते हैं। यहाँ सूखी मूंग बनायीं जाती थी।

आग उस समय लगी जब कच्ची मूंग की प्रोसेसिंग के दौरान गैस लीक हुई और पाइप से होते हुए कम्प्रेसर तक आग पहुंच गयी। कम्प्रेसर के गर्म हो जाने से उसमें विस्फोट हो गया और आग ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल तक पहुंच गयी। और मज़दूरों को अपनी चपेट में ले लिया।

दिल्ली में फैक्ट्रीयों में आये दिन कहीं न कहीं आग लगने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। नरेला में ही कई बार आग लगने और फैक्ट्रीयों में विस्फोट की घटनाएं सामने आयी हैं। लेकिन उसके बाद भी न श्रम विभाग और न ही सरकार इस ओर ध्यान दे रही है। और यह अकारण नहीं है। दरअसल मज़दूरों की जिंदगी का कोई मोल इनकी नज़रों में है ही नहीं।

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।