देशभक्ति और झूठ का कारोबार

/deshbhakti-aur-jhuth-kaa-karobaar

पुरानी कहावत है कि युद्ध का पहला शिकार सच होता है। युद्ध में दोनों पक्ष अपनी जनता और बाकी दुनिया की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव अर्धसत्य और झूठ का सहारा लेते हैं। ऐसा करते समय वे किसी भी नैतिकता की परवाह नहीं करते। अपने देश के लिए सब कुछ करना है, यही उनकी नैतिकता बन जाती है। मजे की बात यह है कि स्वयं हर संभव झूठ बोलते हुए भी वे दूसरे पक्ष पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं और यह सब करते हुए वे जरा भी नहीं शरमाते। 
    
हालिया भारत-पाकिस्तान सैनिक झड़प में यह सब देखने को मिला। सरकारी पक्ष यानी हिन्दू फासीवादी तो अपने जन्म से ही अर्द्धसत्य और झूठ बोलने के लिए बदनाम रहे हैं। उनकी समूची राजनीति अर्द्धसत्य और झूठ पर टिकी हुयी है, मसला चाहे इतिहास का हो या वर्तमान का। इसी के अनुसार उन्होंने इस बार भी व्यवहार किया। उनके समर्थक पूंजीवादी प्रचारतंत्र ने तो बेशर्मी की सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने तो भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर कब्जा भी करवा दिया। अंत में सारी दुनिया में भारत सरकार की भद्द पिटती देख सरकार ने उनकी बेशर्मी पर थोड़ी रोक लगाने के लिए ‘ऐडवाइजरी’ जारी की। 
    
लेकिन हिन्दू फासीवादियों से भी ज्यादा फजीहत भारत के उदारवादियों और वाम उदारवादियों की हुई। उन्हें देशभक्ति के नाम पर हिन्दू फासीवादी सरकार के पीछे गोलबंद होना पड़ा और उसके तथा हिन्दू फासीवादियों के अर्द्धसत्य और झूठ का प्रचार करना पड़ा। ये लोग इतने नादान नहीं हैं कि इन्हें पता न हो कि सच क्या है और झूठ क्या, खासकर तब जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वैकल्पिक खबरें इन्हें उपलब्ध हों। लेकिन ये क्या करें? इनकी रोजी-रोटी का सवाल है और सरकार का कोप-भाजन बनने का डर भी। ऐसे में हिन्दू फासीवादी सरकार के पीछे लामबंद होकर उसका भोंपू बनना ही उन्हें हर लिहाज से ठीक लगा। 
    
कोई कह सकता है कि उदारवादी तथा वाम-उदारवादी लालच या डर से नहीं बल्कि अपनी मर्जी से सरकार के पीछे गोलबंद हुए। अगर ऐसा है तो यह और भी बुरी बात है। 
    
उदारवादी व वाम उदारवादी पिछले दस-पन्द्रह साल से मोदी सरकार का विरोध करते रहे हैं। उनकी नजर में यह हिन्दू-मुसलमान करने वाली जनतंत्र विरोधी सरकार है। हाल के दिनों में तो कुछ इसे फासीवादी भी कहने लगे थे।
    
यदि यह जनतंत्र विरोधी और साम्प्रदायिक फासीवादी सरकार है तो क्या इसके इस चरित्र का इसकी विदेश नीति से कोई संबंध नहीं होगा? और जब इसका मूल संगठन और उसकी विचारधारा खुलेआम अफगानिस्तान से लेकर इंडोनेशिया तक फैले अखंड भारत को अपना लक्ष्य मानती हो तो क्या इस संबंध को समझना इतना मुश्किल है? पिछले दस सालों में मुसलमान-पाकिस्तान-कश्मीर का जो संबंध देश के हिन्दुओं के दिमाग में बैठाने की कोशिश की गयी है उससे क्या पाकिस्तान के प्रति इस सरकार की नीति का अंदाज नहीं लगता? क्या यह दिन के उजाले की तरह साफ नहीं है कि पाकिस्तान के प्रति इस सरकार की नीति बस मुसलमान विरोधी अंदरूनी नीति का विस्तार मात्र है जिससे हिन्दुओं को सरकार के पीछे गोलबंद करने की कोशिश की जाती है? ऐसे में क्या यह समझना इतना मुश्किल है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर कोई भी झड़प किसके हित में होती है और कौन गाहे-बगाहे इस झड़प को चाहता है? 
    
उदारवादी और वाम उदारवादी राजनीतिक तौर पर परले दर्जे के बेवकूफ ही होंगे जो यह सब नहीं समझते। या यह हो सकता है कि वे समझते तो हैं पर वे खुद इतने अंधराष्ट्रभक्त हैं कि उनकी सारी राजनीतिक समझदारी पाकिस्तान का नाम आते ही हवा हो जाती है। जो पाकिस्तान आबादी, क्षेत्रफल और अर्थव्यवस्था सबमें भारत से पांच-सात गुना कम है वह इन्हें उन्मादी बना देता है और वे अपनी सारी राजनीतिक समझदारी खो देते हैं। 
    
जो भी हो, मामला चाहे लालच या डर-भय का हो अथवा अंध राष्ट्रवाद का, उदारवादियों व वाम उदारवादियों का हिन्दू फासीवादी सरकार के पीछे इस तरह लामबंद हो जाना शर्मनाक था। इससे उस देश का नुकसान ही हुआ है जिसके नाम पर वे यह कर रहे थे। यदि कोई शक हो तो उन्हें जर्मनों से पूछ लेना चाहिए।  

आलेख

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।