‘किस्मत मेहरबान गदा पहलवान’

यह कहावत अमित शाह के बेहद ‘लायक’ पुत्र जय शाह पर एकदम सटीक बैठती है। इस कहावत में आपको ‘किस्मत’ की जगह पर ‘‘बाप’’ पढ़ना पड़ेगा। और बाप भी ऐसा-वैसा नहीं बल्कि अमित शाह जैसा बाप। 
    
जय शाह ‘किस्मत’ की वजह से पहले बीसीसीआई के सचिव बने। सचिव बनते ही जय शाह की दौलत को पांव लग गए। अब उन पर ‘किस्मत’ की और मेहरबानी हुई, और वे इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के अध्यक्ष बन गए। ‘किस्मत’ का ऐसा दबदबा रहा कि अध्यक्ष पद के लिए उनके सामने कोई खड़ा तक नहीं हो पाया। अध्यक्ष बनते ही जय शाह ने कहा ‘‘मैं बहुत खुश हूं’’। ‘किस्मत मेहरबान रहेगी (रही) तो महाशय आप ऐसे ही खुश रहेंगे। 
    
जय शाह की खुशी से आप समझ सकते हैं कि परिवारवाद को रात-दिन गाली देने वालों को भी असली खुशी परिवार की मेहरबानी से ही मिलती है। वैसे सबको पता है कि ‘किस्मत’ की वजह से जय शाह पहले बीसीसीआई के सचिव और अब आईसीसी के अध्यक्ष बने हैं अन्यथा उनका क्रिकेट से उतना ही लेना-देना है जितना आजादी की लड़ाई से हिंदुत्ववादियों का था। क्रिकेट के खेल में यदि इतना पैसा ना होता तो बाप कभी अपने बेटे को उस तरफ मुंह भी न करने देता।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।