मजदूर संघर्ष

पेंशन और छुट्टा पूंजीवाद

    फ्रांस में पेंशन सुधारों के खिलाफ लगभग समूचा मजदूर वर्ग बीते कई महीनों से संघर्ष कर रहा है। फ्रांसीसी मजदूर वर्ग काम करने की उम्र 62 से 64 वर्ष किये जाने के सरकारी फरमान को स्वीकारने को तैयार न

श्रीलंका : आतंकवाद विरोधी बिल के विरोध में हड़ताल

    25 अप्रैल को श्रीलंका का उत्तरी व पूर्वी प्रांत पूरी तरह ठप रहा। दोनों प्रांतों के लोग राष्ट्रपति विक्रमसिंघे के नये आतंकवाद विराधी कानून के विरोध में हड़ताल व चक्का जाम पर थे। इस नये कानून के त

मलयाना नरसंहार के दोषी रिहा

एक लम्बे इंतज़ार के बाद 1 अप्रैल को मेरठ के मलयाना नरसंहार का फैसला आ गया और इस फैसले में 39 दोषियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। इस नरसंहार में 93 लोगों को दोषी बनाया गया था। इसमें से

पंतनगर विश्व विद्यालय का 13 अप्रैल 1978 गोली कांड

(13 अप्रैल 1978 का पंतनगर का गोलीकांड इस बात का गवाह है कि कैसे भारत के सार्वजनिक उपक्रमों में भी मजदूरों का निर्मम दमन-उत्पीड़न किया जाता था। कि आजाद भारत के शासक क्रूरता में ब्रिटिश हत्यारों से कह

बेलसोनिका मजदूरों का संघर्ष जारी

गुड़गांव/ अपने संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए बेलसोनिका यूनियन ने 8 अप्रैल को दिल्ली के जंतर मंतर में एक प्रेस वार्ता बुलाई। प्रेस वार्ता में शामिल हुए पत्रकारों और मजदूर संगठन की प्रतिनिध

मई दिवस के शहीद और 8 घण्टे का कार्यदिवस

(मई 1886 में अमेरिका में काम के घण्टे 8 करने की हमारे पूर्वजों ने एक जंग छेड़ी थी। उनके संघर्ष के दम पर ही दुनिया भर के साथ भारत में भी 8 घण्टे के कार्यदिवस का अधिकार मजदूर वर्ग को मिला। पर बीते

जलियांवाला बाग कांड की बरसी पर विभिन्न कार्यक्रम

जलियांवाला बाग हत्याकांड इतिहास में दर्ज एक ऐसा अध्याय है जो कि भारतीय जनता के खून से लिखा गया है। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा 13 अप्रैल, 1919 के दिन पंजाब में अमृतसर के इसी बाग में अंधाधुंध फा

26 मार्च - 8 घंटे की सामूहिक भूख हड़ताल

यह सामूहिक भूख हड़ताल मजदूर विरोधी 4 लेबर कोड रद्द करने, ठेका प्रथा खत्म करने, खुली-छिपी छंटनी करना बंद करने, तीन बर्खास्त मजदूर साथियों को काम पर वापस लेने, तीन निलंबित यूनियन प्रतिनिधियों को तत्का

फ्रांस के मजदूरों का बढ़ता संघर्ष

फ्रांस

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने मजदूरों की पेंशन में कटौती के अलावा सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 64 वर्ष कर दी है। यह उन्होंने संसद में पारित किये बगैर किया है। फ्रांसीसी सरकार के इस रवैये के विरुद्ध

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।