प्रधानमंत्री के नाम पत्र

सेवा में, 

माननीय प्रधानमंत्री 
    
पता नहीं आपके पास इन दिनों हमारे इस पत्र को पढ़ने का समय है या नहीं। लेकिन फिर भी ये पत्र हम आपको लिख रहे हैं। यह पत्र हम सब मज़दूरों की तरफ से है जो दिन-रात मेहनत करते हैं इस उम्मीद में कि दो पैसे मिल जाएं ताकि दो वक्त की रोटी सुकून से खा सकें।  
    
हमें पता है कि आप इन दिनों लोकतंत्र के महापर्व यानी चुनाव अभियान में व्यस्त हैं ताकि 4 जून को आप एक बार फिर से इस देश की बागडोर संभाल सकें। और अपनी दी हुई गारंटियों को पूरा कर सकें। लेकिन इस पत्र को आप उस दिन जरूर पढ़ना जब अंतिम चरण का चुनाव अभियान थम जाए और आप अपने अभियान की थकान उतार रहे हों ताकि हमारी थकी हुई देह का थोड़ा सा अहसास आपको भी हो सके। 
    
वैसे इस पत्र को लिखने की प्रेरणा हमें आपके उस चुनावी अभियान के एक भाषण से मिली जो आपने नागपुर में एक चुनावी जन सभा को सम्बोधित करते हुए दिया था। इसमें आपने अपने पिछले दस सालों के शासन को ट्रेलर कहा था। और यह भी कहा था कि यह अप्पीटाइज़र है। आपने हमारी सहूलियत के लिए यह भी बता दिया था कि अप्पीटाइज़र क्या होता है? जब कोई आदमी होटल में खाना खाने जाता है तो उससे पहले उसे अप्पीटाइज़र दिया जाता है खाना खाने से पहले। इसको जानने के बाद जब हम अपने होटल (जिसे लोग ढाबा भी कहते हैं) में खाना खाने गये तो हमने होटल के मालिक से पूछा कि आप हमें अप्पीटाइज़र क्यों नहीं देते, सीधे खाना देते हो। होटल के मालिक ने हमारी तरफ अजीब सी निगाहों से देखा। उसे लगा कि आज हम कहीं अफीम तो नहीं खाकर आये हैं। जब हमने उसे आपके भाषण के बारे में बताया तो पहले तो वह जोर से हंसा। उसने कहा कि जिन होटलों में अप्पीटाइज़र मिलता है उन होटलों में जाने की हमारी हैसियत नहीं है और हमारे खाने से ज्यादा अप्पीटाइज़र की कीमत होती है। और उन होटलों में अमीर आदमी जाते हैं। और हाँ अप्पीटाइज़र भूख को बढ़ाने के लिए दिया जाता है। हम तो वैसे भी उसके यहाँ भूखे-प्यासे आते हैं। 
    
जब खाना खाकर हम अपने घर पहुंचे तो उस रात हमें नींद नहीं आयी। बिजली चली गयी थी और मच्छरों ने काट काट कर बुरा हाल कर दिया था। हम सोचते रहे कि आपने अपने दस सालों के शासन की तुलना अप्पीटाइज़र से क्यों की और क्या आप अगला चुनाव जीतकर हमारे लिए पूरा भोजन लाने वाले हैं। इसी सोच में कब आँख लगी मालूम नहीं चला।
    
रात को नींद न आने की वजह से थोड़ी देर से आंख खुली। लेकिन हम मजदूरों के लिए देर से उठना कोई मुसीबत से कम नहीं है। उठकर देखा तो सार्वजनिक शौचालय के बाहर भीड़ थी। 8 बजे की ड्यूटी थी। इसलिए भागकर पटरी पर ही फ्रेश हो लिए। आपके भारत स्वच्छता मिशन में हमने बाधा डाल दी। इसके लिए आप हमें माफ़ कर दीजिये। अगर ऐसा न करते तो हम लेट हो जाते और ठेकेदार हमारी दिहाड़ी काट लेता। इस महीने बच्चे की कॉपी-किताब भी लानी थी। इसलिए पैसा कम हो जाता। बूढ़े मां-बाप की दवाई भी लानी थी। वो क्या है न कि आपका आयुष्मान तभी चलता है न जब मरीज भर्ती होता है।
    
फैक्टरी पहुंचकर रोज की भांति हम अपने काम में लग जाते हैं। लेकिन अप्पीटाइज़र के बारे में बार-बार ध्यान भटक जाता था। तरह-तरह के सवाल दिमाग़ में घूम रहे थे। हमको तो अप्पीटाइज़र नहीं मिलता लेकिन हमें तो भूख खूब लगती है। यह अलग बात है कि हम बाज़ार से अपनी भूख के हिसाब से खाना नहीं खरीद पाते। कभी प्याज़ महंगा होता है तो कभी टमाटर। इसके लिए हमने एक तरीका निकाला है। हम निर्मला ताई की बात पर ध्यान देते हैं। और प्याज-लहसुन खाना छोड़ देते हैं।
    
हम अपने ख्यालों में खोये काम कर ही रहे थे कि जोर से धमाके की आवाज़ होती है। धमाके वाली जगह पर जब पहुँचते हैं तो पता चलता है फैक्टरी का वॉयलर फट गया है। चारों तरफ मांस के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। वॉयलर पुराना पड़ गया था। नया वॉयलर भी आ चुका था। लेकिन लगाया नहीं था। क्योंकि मालिक को आर्डर पूरा करना था। अगर वॉयलर बदलता तो आर्डर समय से पूरा नहीं हो पाता। पुलिस आयी और अपना काम निबटा करके चली गयी।
    
शुक्र था कि उस समय एक ही मज़दूर वॉयलर के पास था। हाँ, हम मज़दूर इसी तरह जान बचने पर भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं।
    
हादसे की वजह से मन कुछ बैचेन था। लेकिन आपकी अप्पीटाइज़र वाली बात निकल नहीं पा रही थी। हमें लग रहा था कि आप कोई बात यूं ही नहीं कहते। अगर आपने पिछले दस सालों के शासन को अप्पीटाइज़र कहा है तो कुछ सोच-समझकर ही कहा होगा। हमारा तुच्छ मन आपके मन की बात समझ नहीं पा रहा था। 
    
ठेकेदार ने हमसे हादसे के कारण दो दिन तक फैक्टरी में आने से मना कर दिया था। इसलिए सोचा कि आस-पास घूम लिया जाये। बड़े दिनों बाद घूमने को मिला था। वैसे भी रोज फैक्टरी से कमरा और कमरे से फैक्टरी ही जाते थे। सन्डे को भी ठेकेदार काम पर बुला लेता था। 
    
थोड़ी दूर आगे जाने पर फैक्टरी के बाहर लम्बी लाइन लगी थी। अपने कुछ महीने पहले के दिन याद आ गये जब गांव से आने के बाद इसी तरह लाइन में लगे थे। और ठेकेदार ने फैक्टरी में हमारी भर्ती करवाई और कम्पनी प्रबंधक ने हमको नौकरी देने से पहले ही हमसे इस्तीफ़ा लिखवा लिया था।
    
आगे बढ़ने पर हमने देखा कि कुछ लोग एक किताब बांट रहे थे। जब हमने उनसे पूछा कि यह क्या है। तब उन्होंने बताया कि मोदी ने मजदूरों के खिलाफ और पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए चार कानून बनाये हैं। इस किताब में उसी के बारे में लिखा गया है। और उन्होंने ये भी बताया कि किस तरह मोदी सरकार ने अपने दस सालों के शासन काल में मज़दूर महिलाओं से रात्रि की पाली में काम करवाने वाला कानून, नौजवान अप्रेन्टिस को मज़दूर के समान अधिकार न देने समेत कई कानून पास किये हैं।  
    
हमें कुछ साल पहले चले किसान आंदोलन के बारे में भी याद आया कि किस तरह मोदी सरकार ने किसानों के खिलाफ तीन काले कानून पास किये थे। उस समय हमारे गांव से भी किसान आंदोलन में गये थे और दो किसान वापिस जिंदा नहीं लौटे। सुना था कि बाद में मोदी ने वो कानून वापिस ले लिये थे।
    
उन लोगों से किताब लेकर हमने वो किताब पढ़ी। उस किताब की कुछ बातें हमारी समझ में नहीं आयीं लेकिन इतना समझ में आ गया कि पिछले दस सालों में हम मज़दूरों की बात करते-करते आपने हमारे सारे अधिकार छीन लिए हैं। हम मजदूर स्थायी न हो सकें इसके लिए आपने हमारे लिए फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट का कानून बना दिया। ताकि हम जिंदगी भर ठेके पर काम करते रहें। हम मालिकों के खिलाफ एक न हो जाएं इसके लिए आप हमारे ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार ही ख़त्म करने पर तुले हो। 
    
और भी बहुत कुछ हमें उस दिन मालूम हुआ। हमें यह भी समझ में आ गया कि क्यों उस दिन हादसे के बाद पुलिस अपना काम निबटा कर चली गयी। और उसने मालिक से कुछ नहीं कहा। हमें यह भी समझ में आया कि हमारी थाली का खाना कहाँ जा रहा है। हमें यह भी समझ में आया कि हमारे काम के घंटे 8 से 12 कैसे हो गये हैं। हमें यह भी समझ में आया कि जब हम एक बार गांव से शहर से आ रहे थे तो रास्ते में हर स्टेशन और गाड़ी में इतने नौजवानां की भीड़ क्यों थी। स्टेशन पर पैर रखने की जगह तक नहीं थी। 
    
और हाँ हमें यह भी समझ में आ गया कि आप अपने पिछले दस सालों के शासनकाल को अप्पीटाइज़र क्यों कह रहे थे। आप अपने आकाओं को इशारा कर रहे थे कि अभी तो आपने उनके लिए अप्पीटाइज़र पेश किया है पूरी थाली तो अभी बाकी है। 
    
हमें यह भी समझ में आया कि पिछले दिनों इलेक्टोरल बाण्ड का घोटाला क्या था। क्यों आपको ही सेठों ने सबसे ज्यादा चंदा दिया था। ताकि इसी तरह आप उनका मुनाफा बढ़ाते जाओ। लेकिन हम भी अकेले नहीं हैं और हम सब मज़दूर आपको पूंजीपतियों के लिए थाली नहीं परोसने देंगे। आपने जब अभी ही अप्पीटाइजर उनको पेश कर हमारी हालत ऐसी कर दी है तो जब उन्हें थाली परोसने चलोगे तो हमारी हालत क्या होगी।  
    
चाहे भले ही 4 जून को आप फिर से प्रधानमंत्री बन जाएं लेकिन हम सब अब आपका साथ नहीं देंगे। आपकी थकावट भले ही अंतिम चरण के चुनाव अभियान के बाद उतरे लेकिन हम अपनी थकान को अभी से उतारना शुरू करते हैं जो वर्षों से हमारे दिलो दिमाग़ पर छा गयी है। 
        -एक मजदूर

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