फासीवाद / साम्प्रदायिकता,
अपनी जनता चुनती सरकार
जिस सरकार को जनता ने चुना आज वही सरकार जनता को चुन रही है। सरकार दिल्ली में मस्ती में बैठी है और जनता खुद को जनता साबित करने की कवायद में जुटी है। चुनाव आयोग ने लगभग आधे
संचार साथी नहीं सरकारी जासूसी
पिछले दिनों मोदी सरकार ने गुपचुप तरीके से सभी मोबाइल फोन निर्माताओं को निर्देश दिया कि वे सभी फोनों में ‘संचार साथी एप’ अनिवार्य रूप से इंस्टाल करें। यहां तक कि यह एप लोग
न दिन में चैन, न रात को आराम
‘वर्कफ्रोम होम’ (घर से काम) को कुछ वर्ष पहले बड़े मजे की चीज समझा जाता था। अब हालात ऐसे हो गये हैं कि लोग इससे निजात चाहते हैं। पहले सोचा था कि क्या मजे की बात है कि अपने
आतंकवाद के नाम पर मजदूरों को आतंकित करने की कोशिश
दिल्ली लाल किले के पास विस्फोट और कश्मीर में हुई हालिया विस्फोट की घटना के बाद पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर सरकार द्वारा आतंक कायम किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ
अजीत डोभाल की पलटी पड़ गई उलटी
बीती 10 नवम्बर को एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी हुआ जिसमें देश के मुख्य सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कह रहे हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई ने मुसलमानों से ज्यादा
हिटलर के वारिस
ऐसा लगता है कि भाजपा के नेताओं को हिरासत शिविरों से ‘अति प्रेम’ है। कभी असम का मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हिरासत शिविरों की बात करता है तो कभी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ।
अजब-गजब धर्मनिरपेक्षता
25 नवम्बर को दो घटनाएं घटीं। दोनों घटनाओं का धर्म से सम्बन्ध है। दोनों घटनाओं से संबंधित व्यक्ति अपने-अपने धर्म पर विश्वास करते हैं और अपने धार्मिक विश्वास के साथ आचरण कर
राष्ट्रीय
आलेख
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।