फासीवाद / साम्प्रदायिकता,

शरणार्थियों के नाम पर अंधराष्ट्रवादी राजनीति

दुनिया भर में शासक वर्ग अमानवीय होकर अपने-अपने देश में शरणार्थियों के मुद्दे को उठाए हुए है। शासक वर्ग अपने घृणित राजनीतिक लाभ के लिए शरणार्थियों के नाम पर राजनीति करने स

झूठे राष्ट्रवादियों का नंगा समर्पण

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भारत और ब्रिटेन के बीच हुए ‘मुक्त व्यापार समझौते’ को ऐतिहासिक समझौते की संज्ञा दी जा रही है। निःसंदेह यह समझौता इस मामले में ऐतिहासिक है कि अपने आपको सबसे बड़ा राष्ट्रवादी

सवालों से भागती मोदी सरकार

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बीते दिनों संसद के दोनों सदनों में आपरेशन सिंदूर पर चर्चा हुई। इस चर्चा में विपक्ष द्वारा उठाये गये एक भी सवाल का जवाब देने की मोदी सरकार ने जरूरत नहीं समझी। सवालों के जव

उपराष्ट्रपति : बड़े बेआबरू हो.....

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उपराष्ट्रपति धनखड़ के अचानक इस्तीफे पर तरह-तरह की अटकलबाजियां की जा रही हैं। हर कोई इस बात पर एकमत है कि धनखड़ द्वारा स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफे की जो बात कही गयी वह सच्चा

75 वर्ष : भागवत-मोदी दोनों की गले की हड्डी

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बीते दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 75 वर्ष पूरे होने पर रिटायर होने व नये लोगों को आगे आने का मौका देने की बात कर मोदी को याद दिला दिया कि वे बहुत जल्द 17 सितम्बर 25 को

कांवड़ यात्रा और धर्म के ठेकेदार

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कांवड़ यात्रा शुरू होते ही हिन्दू धर्म के संघी लम्पट ठेकेदारों को भी रोजगार मिल जाता है। रोजगार समाज में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने का, गुंडागर्दी करने का, मारपीट करने

सबसे बड़ा कालनेमि कौन

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पिछले दिनों से उत्तराखण्ड सरकार ने ‘आपरेशन कालनेमि’ चलाया हुआ है। इस पुलिसिया आपरेशन के तहत पुलिस वाले साधु वेष या भगवा वस्त्र पहने हुए लोगों की जांच पड़ताल कर रहे हैं। घो

मणिपुर के बाद महाराष्ट्र में आग लगाते शासक

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पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग ने स्कूलों में कक्षा एक से पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी लागू करने का फैसला लिया। अभी तक राज्य में मराठी और अंग्रेजी ही पहली कक्षा से पढ़ाई ज

मुसलमानों का यथार्थ और राष्ट्रवाद का मिथक -देवेन्द्र

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गांव को लेकर हमारे जीवन और जेहन में जितनी भी यादें हैं, उसमें घर वालों के अलावा सबसे ज्यादा आत्मीय याद समतुल्लाह चाचा की ही है। उनके बगैर मेरे घर की कोई दिनचर्या उन दिनों

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।