रिक्तता

/riktataa

मोहन पूरी ताकत से प्रकाश की उंगलियां दबा रहा है। प्रकाश का हाथ बिल्कुल ढीला है और  उंगलियों में कोई प्रतिरोध नहीं है। ढीली उंगलियों का मांस और उसके भीतर मौजूद हड्डियां आपस में रगड़ रही हैं लेकिन दर्द का कोई भाव माथे से अदृश्य है। अंततः सारी ताकत एक संचित मजबूती से हार मान लेती है। ‘‘यहां काम करते हुए कितने साल हो गए?“ मोहन ने प्रश्न किया। ‘‘करीब 12 साल हो गए। पहले फाउंड्री में था, अब करीब 10 साल से मशीन शॉप में क्वालिटी का काम देख रहा हूं।’’ प्रकाश ने जवाब दिया।
    
पहले प्रकाश का काम मेहनत का जरूर था लेकिन नियमित नहीं था। काम की अराजकता और अनियमितता उसे फैक्टरी तक लाई। पिता, छोटा भाई, मां के जीविका निर्वहन से लेकर सामाजिक संबंध इन सब को निभाने का एकमात्र जरिया अब इस फैक्टरी से ही जुड़ा है। 
    
प्रकाश की उंगलियां बड़ी सहजता से 8 किलो भारी पुर्जे को उंगलियों और कलाई से उल्टा लटका सकती हैं। ये सिर्फ उसी के बस की बात है। फैक्टरी में निर्मित ऐसा कोई पुर्जा न था जिसकी बारीकी से वो अनजान हो। ऐसा कोई काम नहीं है जिसे करने में वो अक्षम हो। उसने कभी भी किसी अधिकारी के आदेशों की अवहेलना करना नहीं सीखा है और शायद इसीलिए वो हर अधिकारी का चहेता है। 
    
कहते हैं दुनिया में जितना दिखाई देता है उससे ज्यादा स्थान रिक्तता का होता है। क्या प्रकाश दारू पीकर आया है? सुपरवाइजर ने प्रश्न किया। ‘‘पता नहीं! कल उसके घर में पार्टी थी। चाचा, ताऊ, पिता, भाई सब पीकर सेट थे’’। साथ के मजदूर ने जवाब दिया। ‘‘इसके घर का यही हाल है। सब दारूबाज एक जैसे हैं’’। सुपरवाइजर की बातों में घृणा का भाव था। सुपरवाइजर जानता है कि अब ये आलम चार-पांच दिन तक चलने वाला है। और ऐसा अक्सर होता रहता है। ‘‘देख लेना किसी से झगड़ा न करे’’। हिदायत देकर सुपरवाइजर चला गया।
    
‘‘मां की तबियत खराब है, पीएफ से पैसा निकलवाना है। ई इस आई वालों ने बाहर से इलाज के लिए बोला है। एक मजदूर साथी ने इस काम में उसकी मदद की। खैर कुछ दिन में पैसा तो निकल गया लेकिन सारे प्रयासों के बावजूद जीवन बचाने की सारी कवायद बेकार गई। जीवन की और परिवार की सबसे मजबूत कड़ी का टूट जाना एक बड़ा आघात था। परिवार अब भी था, उसके लिए दायित्वबोध अब भी मुंह बाए खड़ा था लेकिन ममता, लगाव और ख्याल रखने वाली दुनिया खत्म हो गई थी। जो आत्मिक सुख अब तक मिलता आया था अब वो दूर-दूर तक रिक्त हो चुका है।
    
बचा हुआ पी एफ का पैसा भाई की शादी में लगा दिया। और शादी के दौरान कर्जजाल ने भी दामन जोड़ लिया। कर्ज, परिवार का राशन, किराया इन सब के साथ खुद के परिवार बसाने की चाहत अब ज्यादा घनीभूत हो चुकी है। परिवार से अलग होकर खुद का घर बसाने की कोई भी हिदायत, जिसे मन तो स्वीकार कर लेता लेकिन वो कौन सी बाधा है जिसे तोड़ने में प्रकाश लाचार हो जाता है इसका भान किसी को नहीं हो पाता। अक्सर नशे की हालत में अपनी लाचारगी की वजह सामाजिक जवाबदेही को ठहराया जाता।
    
‘‘अपने लिए कपड़े सिलवा ले’’। किसी ने चुटकी ली। ‘‘हां कल को जा रहा हूं कपड़े सिलवाने’’। शादी करने के रूहानी ख्वाबों के साथ प्रकाश खुश है और मन ही मन शादी की योजनाएं बन रही हैं। लेकिन ये खुशियां पल भर की साबित हुईं। शादी रद्द होने की कोई ठोस वजह प्रकाश ने न बताई लेकिन उसके बाद शराब का जो दौर चला उसने हास्पिटल जरूर पहुंचा दिया। फेफड़े, किडनी, लीवर, हार्ट एक भीतर से हारे हुए इंसान का साथ छोड़ चुके थे। अंतिम आशा डाक्टर की हिदायत थी कि दुबारा शराब पी तो कोई नहीं बचा पाएगा। जीवन की कोई कड़ी अब भी मौजूद थी। शायद अपने हिस्से की कुछ सांसें अभी बाकी थीं।
    
गोरा रंग, भरा हुआ चेहरा, मजबूत शरीर की जगह महज हड्डियों का ढांचा जिस पर मानो खाल का लेप लगा हो। कदमों में चलने की ताकत भी शेष नहीं है। धीरे-धीरे फैक्टरी की तरफ बढ़ती हुई देह। वो उंगलियां जो मानो सरिया को भी मोड़ने में सक्षम थीं आज पानी का गिलास उठाने में भी सोच में पड़ जाती हैं। प्रकाश को इस आखिरी वक्त में देखकर मोहन को पहली मुलाकात की याद हो आई। एक गहरी वेदना से मन दुःखी हो उठता है कि कैसे मृत्यु एक जवान जिंदगी को लील जाने के लिए व्याकुल हो उठी है।
    
कुछ महीनों बाद जीवन पूरी तरह अशक्त हो चुका है। आवाज निकलना बंद हो चुका है। फैक्टरी प्रबंधन ने कंपनी आने के लिए मना कर दिया है और कई दिनों तक कोई खबर नहीं है। प्रबल जिज्ञासा के वशीभूत हो मोहन ने प्रकाश के नम्बर पर फोन किया। ‘‘हेलो क्या प्रकाश से बात हो जाएगी? जवाब में भाई का उत्तर आता है’’ अब प्रकाश से बात नहीं हो पाएगी। डाक्टर ने जवाब दे दिया है’’। उसके बाद मोहन ने और कोई प्रश्न नहीं किया।
    
लेकिन मोहन के मन में अब बहुत से प्रश्न थे जिनका जवाब न तो प्रकाश के भाई के पास था और न ही प्रकाश का इलाज करने वाले डाक्टर के पास। उन जवाबों की जगह महज रिक्तता थी।         -पथिक
 

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