सार्बिया में छात्र आंदोलन ने फासीवादी वुसिक को सत्ता से किया बेदखल

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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हंगरी में विक्टर ओर्बान के सत्ता से बेदखल होने के बाद अब सार्बिया के अलेक्जेंडर वुसिक को भी सत्ता से हाथ धोना पड़ा है। विक्टर ओर्बान की तरह वुसिक भी घोर फासीवादी रुझान रखते थे। दोनों ने ही ऐसी सत्ता कायम की हुयी थी जिसमें विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों के लिए भी स्थान नहीं था। वुसिक ठीक उसी वर्ष सत्ता में आये जब भारत में नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये थे। मोदी की तरह वुसिक की राजनीति भी घोर मुसलमान विरोध पर केन्द्रित थी। वुसिक कैसा आदमी था उसे उसके एक बयान से समझा जा सकता है। वुसिक कहता था, ‘‘अगर एक सर्व मारा जायेगा तो वह सौ मुसलमानों को मारेंगे’’। 
    
विक्टर ओर्बान, अलेक्जेंडर वुसिक और नरेन्द्र मोदी के भाषणों, कारनामों में इतनी अधिक समानता है कि आप इनमें से किसी एक को सुनेंगे तो लगेगा कि अन्य भी वही कुछ अपने देश में उसी भाषा में, उसी अंदाज में बात कर रहे हैं। 
    
वुसिक को सत्ता से बेदखल करने में छात्र-युवा आंदोलन की भूमिका केन्द्रीय व निर्णायक रही है। वुसिक के लिए विपक्षी पार्टियों से निपटना बांये हाथ का खेल रहा है परन्तु दो वर्ष पूर्व शुरू हुए छात्र आंदोलन ने उनकी सत्ता को लील लिया। वुसिक रूस के पुतिन या तुर्की के एर्दोगान की तरह कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री बनकर सत्ता मंे बने रहने की जुगत लगाता रहा है। उसने अभी सितम्बर में राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया और क्योंकि वह दुबारा राष्ट्रपति नहीं बन सकता था इसलिए वह प्रधानमंत्री बनने के चक्कर में था। वुसिक के मंसूबों पर छात्र आंदोलन ने पूरी तरह से पानी फेर दिया है। यूरोप के कई देशों की तरह सार्बिया में भी एक जबरदस्त छात्र-युवा आंदोलन की लहर चल रही थी। और फिर जिस तरह से वुसिक सत्ता से बाहर हुआ है उसने अनायास ही हमारे देश के पड़ोसी देशों बांग्लादेश व नेपाल के सत्ता विरोधी आंदोलनों की याद ताजा कर दी है। 
    
25 अक्टूबर को सर्बियाई संसदीय चुनाव में ‘स्टूडेंट लिस्ट’ नामक दल ने 250 में से 141 सीटों पर जीत दर्ज करायी है। वुसिक को महज 104 सीटें मिली हैं। ‘स्टूडेंट लिस्ट’ के 250 उम्मीदवारों में 160 से भी अधिक पी एच डी धारक थे। 
    
सार्बिया में छात्र आंदोलन की शुरूवात तब हुयी जब सार्बिया के एक रेलवे स्टेशन की छत के टूटने से 16 लोग मारे गये थे। इस दुर्घटना के पीछे वुसिक की पार्टी और भ्रष्ट व संगठित अपराधियों के गठजोड़ को कारण माना गया। ‘सार्बिया या माफिया’ नारे ने लोकप्रियता हासिल की। छात्रों ने वुसिक के तानाशाही पूर्ण रवैये, भ्रष्टाचार, संस्थागत सुधार, शिक्षा व रोजगार जैसे मुद्दे उठाये। और ठीक चुनाव के पहले अपने आंदोलन को चुनाव अभियान मंे बदल दिया और देखते ही देखते वुसिक को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। वुसिक के सत्ता से बाहर होते ही सार्बियाई समाज ने आजादी की एक सांस ली है। 
    
सार्बिया में ‘स्टूडेंट लिस्ट’ की सत्ता क्या गुल खिलायेगी यह आने वाला समय बतायेगा। इनकी सबसे बड़ी सीमा इनकी उदारवादी पूंजीवादी विचारधारा ही है। पूंजीवाद के भीतर आम मजदूर मेहनतकशों के लिए जनवाद, बराबरी, भ्रष्टाचार मुक्त समाज, सबको रोजगार, अच्छी-सस्ती शिक्षा आकाश कुसुम की तरह ही है।     

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