फासीवाद

कुम्भ, धार्मिकता और साम्प्रदायिकता

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असल में धार्मिक साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक परिघटना है। धार्मिक साम्प्रदायिकता का सारतत्व है धर्म का राजनीति के लिए इस्तेमाल। इसीलिए इसका इस्तेमाल करने वालों के लिए धर्म में विश्वास करना जरूरी नहीं है। बल्कि इसका ठीक उलटा हो सकता है। यानी यह कि धार्मिक साम्प्रदायिक नेता पूर्णतया अधार्मिक या नास्तिक हों। भारत में धर्म के आधार पर ‘दो राष्ट्र’ का सिद्धान्त देने वाले दोनों व्यक्ति नास्तिक थे। हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाले सावरकर तथा मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की बात करने वाले जिन्ना दोनों नास्तिक व्यक्ति थे। अक्सर धार्मिक लोग जिस तरह के धार्मिक सारतत्व की बात करते हैं, उसके आधार पर तो हर धार्मिक साम्प्रदायिक व्यक्ति अधार्मिक या नास्तिक होता है, खासकर साम्प्रदायिक नेता। 

जर्मनी में धुर दक्षिणपंथी उभार के मायने

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जर्मनी में हुए हालिया चुनाव में जहां दक्षिणपंथी पार्टी सीडीयू 28.5 प्रतिशत वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई, वहीं विगत चुनाव में पांचवे नम्बर की पार्टी रही धुर

जनगणना असंभव पर कुंभ गणना आसान

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कुंभ में स्नान करने वालों की संख्या 62 करोड़ को पार कर गयी। ऐसा दावा अपने को योगी कहने वाले सत्ता के रोगी ने किया। कमाल है यह कि जो मोदी सरकार आज तक जनगणना नहीं करा सकी उस

इनकी सूरत को पहचानो भाई

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देहरादून/ हिंदू फासीवादी अपने नये-नये नामों से संगठन बनाकर समाज में मुसलमानों के खिलाफ घृणित अभियान चला रहे हैं। कुछ दिन शांत रहने के बाद उत्तराखंड में न

महामहिम ! परजीवी कौन हैं?

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बीते दिनों भारत के सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों ने मुफ्त सुविधाओं की घोषणाओं पर प्रश्न उठा दिया। न्यायमूर्ति गवई व एजी मसीह ने बेघर व्यक्तियों के आश्रय के अधिकार स

हिंदू राष्ट्रवादी और मजदूर वर्ग

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आज भारत में राष्ट्रवादियों की एक ऐसी जमात मौजूद है जो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। इन राष्ट्रवादियों को हिंदू राष्ट्रवादी कह सकते हैं। इन हिंदू राष्ट्रवादियों के

इसे कहते हैं, ‘मुंह में दही का जमना’

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हमारे देश में राष्ट्रवादियों की भरमार है। जो सबसे ज्यादा पाये जाते हैं वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। कहा जाता है कि राष्ट्रवादी वे होते हैं जो राष्ट्र की चिंता करते हैं। राष

होश खोते होसबोले

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ट्रम्प से लेकर संघ तक सब ‘वोकिज्म’ (Wokeism) से परेशान हैं। ट्रम्प अपने यहां इसे खतरा बताता है तो संघ भारत में इसे खतरा बताता है। दोनों को एक ही चीज परेशान कर रही है। दोन

भारतीय सेना का हिन्दू साम्प्रदायीकरण

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नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में केन्द्र में सत्तानशीन होने के बाद हिन्दू फासीवादी भारतीय सेना में लगातार घुसपैठ करते चले गये हैं। हिन्दू फासीवादियों की सरकार ने प्र

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।