टैरिफ युद्ध और ऑटो उद्योग
बीते दिनों अमेरिका की ट्रम्प सरकार ने विदेशी निर्मित कारों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। ट्रम्प की इस घोषणा से वैश्विक आटो उद्योग में उथल-पुथल मच गयी है। लगभग
बीते दिनों अमेरिका की ट्रम्प सरकार ने विदेशी निर्मित कारों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। ट्रम्प की इस घोषणा से वैश्विक आटो उद्योग में उथल-पुथल मच गयी है। लगभग
इजरायल की नेतन्याहू की सरकार ने युद्ध विराम को समाप्त करके गाजापट्टी में नरसंहार फिर से शुरू कर दिया है। उसने युद्ध विराम के पहले के समझौते को दूसरे चक्र में आगे बढ़ाने से
पूर्वी यूरोप का एक देश रोमानिया है। वहां के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जार्जेस्क्यू को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है। वे धुर दक्षिणपंथी हैं। इसके पहले वे चुनाव में जीत की
अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा गाजापट्टी से फिलिस्तीनियों को उजाड़कर कहीं दूसरे देशों में बसाने की योजना को पलीता लगने के बाद अब अमरीकी साम्राज्यवादी सीधे हमास के साथ वार्ता करन
यूक्रेन ने रूस के भीतर अब तक के सबसे बड़े ड्रोन हमले किये हैं। रूस का कहना है कि उसकी वायु रक्षा प्रणालियों ने 337 ड्रोनों को मार गिराया है। इसके बावजूद, राजधानी मास्को और
यूरोपियन व्यापारियों ने मूल अमेरिकियों का संहार तीन तरह से किया। एक लड़ाइयां में, (जिसका अभी जिक्र किया है), दूसरा उन्हें गुलाम बनाकर नारकीय दशाओं में रखकर, तीसरा, स्वयं यूरोप से वहां लाई गई बीमारियों द्वारा। संहार के दूसरी प्रकार के बाबत गालिआनो इस प्रकार बताते हैं, ‘‘तीन सदियों (16वीं से 18वीं) के दौरान पोतोसी (बोलीविया का चांदी खनन केंद्र) के सेर्रोरिको ने 80 लाख जिंदगियों को लील लिया। मूल निवासियों को औरतों और बच्चों समेत उनके कृषिगत समुदायों से नोच लिया गया और उन्हें सेर्रां (चांदी की खानों) में भेज दिया गया। उस बेहद ठंडे बीहड़ में गए हर दस में से सात कभी वापस नहीं आए। स्पेनवासी मजदूरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों में सैकड़ों मील तक घूमते थे। गुलाम मजदूरों में बहुत से पोतोसी पहुंचने से पहले रास्ते में ही मर जाते थे। लेकिन वह खानों में काम करने के भयंकर हालात थे जिन्होंने ज्यादातर लोगों को मारा। बेगार और गुलामी की भयानकता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि मूलवासी उनसे बचने के लिए सैकड़ां की तादाद में सामूहिक आत्महत्याएं कर लेते थे।
अमेरिका, रूस को साधने के बाद यूरोप के देशों से अपनी ही शर्तों पर सौदेबाजी करना चाहता है। यूरोप के देशों के पास सीमित विकल्प हैं इसलिए वे ट्रम्प के जाल में फंसने को मजबूर हैं। वे इस स्थिति में नहीं हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों से खुली टक्कर ले सकें। फिलवक्त रूसी साम्राज्यवादियों खासकर पुतिन के दोनों हाथों में लड्डू हैं। और अमेरिकी साम्राज्यवादी इस मंसूबे को पाल रहे हैं कि उनका दुनिया में वर्चस्व इस तरह से कायम रहेगा।
इस समय, अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए यूरोप और अफ्रीका में प्रभुत्व बनाये रखने की कोशिशों का सापेक्ष महत्व कम प्रतीत हो रहा है। इसके बजाय वे अपनी फौजी और राजनीतिक ताकत को पश्चिमी गोलार्द्ध के देशों, हिन्द-प्रशांत क्षेत्र और पश्चिम एशिया में ज्यादा लगाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में यूरोपीय संघ और विशेष तौर पर नाटो में अपनी ताकत को पहले की तुलना में कम करने की ओर जा सकते हैं। ट्रम्प के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि वे यूरोपीय संघ और नाटो को पहले की तरह महत्व नहीं दे रहे हैं।
इस समय यू एस ए आई डी (यूनाइटेड एजेन्सी फार इंटरनेशनल डेवेलपमेन्ट) को लेकर काफी चर्चा है। इसकी वजह दो हैं। एक तो यह कि ट्रम्प प्रशासन ने दुनिया भर में इसके द्वारा दी जाने
हर साल 9 मई को रूस ‘विजय दिवस’ (विक्ट्री डे) मनाता है। इस साल इस ‘विक्ट्री डे’ परेड में मोदी भी शामिल होंगे। ‘विक्ट्री डे’ में रूस अपनी सैन्य ताकत का खुला प्रदर्शन करता ह
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।