एस.आई.आर. : बिहार के बाद अब 12 राज्यों में फासीवादी परियोजना
चुनाव आयोग बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण कराने के बाद अब इसे पूरे देश पर थोपने को उतारू है। इस सम्बन्ध में 28 अक्टूबर से 7 फरवरी तक 12 राज्यों में एस आई आर की घोषणा चुनाव
चुनाव आयोग बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण कराने के बाद अब इसे पूरे देश पर थोपने को उतारू है। इस सम्बन्ध में 28 अक्टूबर से 7 फरवरी तक 12 राज्यों में एस आई आर की घोषणा चुनाव
दोनों विश्व युद्धों के बीच के काल में, खासकर 1929 से शुरू हुई महामंदी के काल में साम्राज्यवादी देशों के बीच ‘मुद्रा युद्ध’ और ‘तटकर युद्ध’ बहुत तेज हो गया था। निर्यात में बढ़त हासिल करने के लिए देश अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन कर रहे थे और तटकर बढ़ा रहे थे। इसने महामंदी को और घनीभूत किया। इस तरह महामंदी से निकलने के देशों के व्यक्तिगत प्रयास ने वैश्विक तौर पर उसे और घनीभूत किया। अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से महामंदी से निजात मिली।
चुनावी पद्धति और सीमित जनवादी अधिकार (आम नागरिकों के लिए) पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियाद है। इसी के दम पर इसे ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ का मंत्र दोहराया जाता है। असल में यह शांतिपूर्ण काल में पूंजीपति वर्ग की लोकतंत्र की ओट में छुपी तानाशाही से इतर कुछ भी नहीं है। आर्थिक-राजनीतिक संकटों के काल में इस नकाब को हटाने में शासक पूंजीपति वर्ग को ज्यादा वक्त नहीं लगता। इसका एक रास्ता इंदिरा गांधी के जरिए संवैधानिक तानाशाही थोपे जाने के रूप में दिखा तो दूसरा रास्ता हिंदू फासीवादियों के दौर में फासीवादी तानाशाही की ओर बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है।
भारत का चुनाव आयोग आजकल काफी चर्चा में है। एक तरफ बिहार में मतदाता सूची पुनर्रीक्षण पर पहले से ही हल्ला मचा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जारी बिहार की तदर्थ मतदाता सूची में
ठीक जिस वक्त भारत और पाकिस्तान युद्ध के मुहाने पर पहुंच रहे थे ठीक उसी वक्त मोदी सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा की। इस घोषणा के समय (टाइमिंग) ने मोदी के समर्थकों से लेकर व
जर्मनी में हुए चुनाव में सभी पूंजीवादी पार्टियों ने अप्रवासियों के मुद्दे पर एक-दूसरे से प्रतियोगिता की। घोर दक्षिणपंथी पार्टी ए एफ डी (जर्मनी के लिए विकल्प) ने तो 2015 स
दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे एक्जिट पोल को सही साबित करने वाले रहे। दिल्ली की जनता ने इस चुनाव के जरिये बता दिया कि हिंदुत्व की राजनीति करने में बड़े मियां के आगे छोटे म
दिल्ली में दो मियांओं की सरकार है। बड़े मियां की बड़ी तो छोटे मियां की छोटी सरकार।
रुद्रपुर/ नगर निकाय चुनाव उत्तराखण्ड में घोषित हो चुके हैं। 23 जनवरी को होने वाले इन चुनावों के लिए सभी प्रमुख राजनैतिक दल ताल ठोंक चुके हैं। उत्तराखण्ड
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।