दलित उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला
हमारे देश में एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता है जब दलितों के खिलाफ कुछ हिंसा नहीं होती हो। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता होगा, जिस दिन, किसी दलित की हत्या न होती हो। किसी दलित महिल
हमारे देश में एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता है जब दलितों के खिलाफ कुछ हिंसा नहीं होती हो। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता होगा, जिस दिन, किसी दलित की हत्या न होती हो। किसी दलित महिल
एक नई दुनिया का ख्वाब देखने वालों के प्रति वर्तमान व्यवस्था का रुख क्रूरता व हिंसा से भरा हुआ है। और अगर इसके लिए उन्हें फासीवाद की शरण लेनी पड़े तो उन्हें उससे भी गुरेज नहीं है। कोई नई दुनिया का ख्वाब न देखे इसके लिए वे तीखा विचारधारात्मक संघर्ष भी छेड़ते हैं। कभी कहते हैं कि ‘इतिहास का अंत हो गया है’ (मानो इनके कहने से मानवजाति नये इतिहास का निर्माण करना छोड़ देगी), तो कभी कहते हैं इस पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है (दियर इज नो अल्टरनेटिव-टीना)। ये बातें सरासर झूठ हैं। न तो इतिहास का अंत किया जा सकता है और न ही यह बात सच है कि पूंजीवाद का विकल्प नहीं है। पूंजीवाद का विकल्प वैज्ञानिक समाजवाद है।
पूरी दुनिया में इस वक्त राजनैतिक विक्षोभ है। मौसमी विक्षोभ की तरह इसका असर बड़े स्तर से लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग ढंग से हो रहा है। मौसमी विक्षोभ का असर तेज बारिश, बादल
इस खूनी राजसत्ता की मार भारत का सबसे बड़ा शोषित वर्ग- मजदूर वर्ग हर रोज झेलता है। वर्दीधारी लोग उसे कहीं भी कभी भी बेवजह पीट सकते हैं। फैक्टरी के भीतर, सड़क पर, घर में उसे कहीं भी तंग किया जा सकता है। फैक्टरी दुर्घटना से लेकर आपदा तक में उसकी मौत को आसानी से गिनती से बाहर कर दिया जाता है। अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें अक्सर ही लाठी-गोली-जेल का सामना करना पड़ता है।
इसे तारीखों का विचित्र संयोग या फिर भारतीय इतिहास का कटु सत्य भी कह सकते हैं। इस वर्ष, जिस दिन (2 अक्टूबर) गांधी जयन्ती है, ठीक उसी दिन विजयादशमी है। यह तो हो सकता है कि
ऐसे में जब ‘अद्भुत करिश्मे’ की जरूरत हो तब छोटे-मोटे मदारियों की कला से काम नहीं चल सकता है। तत्काल तो इस बात की एक आवश्यकता बनती है कि हिन्दू फासीवादी आंदोलन को चुनौती और शिकस्त दी जाए परन्तु यह ‘अद्भुत करिश्मे’ का एक अंक होगा। क्योंकि आज के सारे ‘लोकतंत्र खतरे में है’ या ‘‘संविधान खतरे में है’’ की पुकार लगाने वाले कभी नहीं चाहेंगे भारत के मजदूर-मेहनतकश ऐसा ‘अद्भुत करिश्मा’ करें जो उनका भी विनाश कर दे।
असली मालिक न तो संसद में विराजमान हैं और न सरकार में बैठे हैं। वे कहीं दूर बैठे-बैठे ही इस देश को अपनी मर्जी से चलाते हैं। मोदी जी ने इनके लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे। संघ के हिन्दू फासीवादी एजेण्डे को खूब चलाया और भारत ही नहीं विदेशी एकाधिकारी घरानों व वित्तीय पूंजी के धंधे की भी खूब मदद की। परन्तु मोदी जी का यह दुर्भाग्य है कि संघी कारकूनों व वित्तीय पूंजी के मालिकों से ही भारत की जनता नहीं बनी है। संघ और एकाधिकारी घरानों के मालिकों के अलावा भी भारत में करोड़ों मजदूर, किसान, मेहनतकश हैं। वे कैसे उन पर भरोसा कर सकते हैं।
जुलाई माह में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में सेनेगल से फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को अपनी सेना को हटाना पड़ा। पिछले तीन वर्षों में सेनेगल सातवां देश है, जहां से फ्रां
अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि केन्द्र व विभिन्न राज्यों में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भारत के मजदूरों व मेहनतकश किसानों, शोषित-उत्पीड़ित जनों के हितों के अनुसार देश को
लम्बे समय से ईरान के ऊपर हमले की तैयारी में लगे जियनवादी फासीवादी, इजरायली शासकों ने सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए 13 जून को उस पर भीषण हमला बोल दिया था। इस
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।