सम्पादकीय

मोदी जी का भविष्य

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असली मालिक न तो संसद में विराजमान हैं और न सरकार में बैठे हैं। वे कहीं दूर बैठे-बैठे ही इस देश को अपनी मर्जी से चलाते हैं। मोदी जी ने इनके लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकते थे। संघ के हिन्दू फासीवादी एजेण्डे को खूब चलाया और भारत ही नहीं विदेशी एकाधिकारी घरानों व वित्तीय पूंजी के धंधे की भी खूब मदद की। परन्तु मोदी जी का यह दुर्भाग्य है कि संघी कारकूनों व वित्तीय पूंजी के मालिकों से ही भारत की जनता नहीं बनी है। संघ और एकाधिकारी घरानों के मालिकों के अलावा भी भारत में करोड़ों मजदूर, किसान, मेहनतकश हैं। वे कैसे उन पर भरोसा कर सकते हैं।

अफ्रीका में मुंह की खाते फ्रांसीसी साम्राज्यवादी

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जुलाई माह में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में सेनेगल से फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को अपनी सेना को हटाना पड़ा। पिछले तीन वर्षों में सेनेगल सातवां देश है, जहां से फ्रां

सत्ता पक्ष और विपक्ष : खोटे सिक्के के दो पहलू

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अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि केन्द्र व विभिन्न राज्यों में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भारत के मजदूरों व मेहनतकश किसानों, शोषित-उत्पीड़ित जनों के हितों के अनुसार देश को

यह ‘युद्ध विराम’ नहीं, नये युद्धों की तैयारी है

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लम्बे समय से ईरान के ऊपर हमले की तैयारी में लगे जियनवादी फासीवादी, इजरायली शासकों ने सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए 13 जून को उस पर भीषण हमला बोल दिया था। इस

लोकलुभावनवाद : मुंह में राम बगल में छुरी

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लोकलुभावनवाद (पापुलिज्म) ने इस वक्त भारत की राजनीति में ही नहीं बल्कि विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया हुआ है। और देखने में आ रहा है कि इसका प्रभाव और विस्तार इतना व्यापक हो गया है कि शायद

अजब-गजब राष्ट्रवाद

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हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी साहब का व्यवहार देखिये। ट्रम्प के सामने ये ढेर हैं। वह इनकी ही नहीं हमारे देश के लोगों की सरेआम बेइज्जती करता है। हथकड़ियों में हमारे महान देश के लोगों को अमेरिका से भूखा-प्यासा संगीनों के साये में भेजता है। भारत के प्रधानमंत्री के मुंह में दही जम जाता है और हालिया चार दिनी युद्ध में अमेरिका हमें हमारी औकात बताता है। मोदी साहब के मुंह से अमेरिका के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं फूटता है और अब ये महाशय देश में शान से फौजी ड्रेस में अपने पोस्टर लगवाते हैं। और अपना ऐसा स्वागत करवाते हैं मानो न जाने कौन सी जंग फतेह कर ली है। ट्रम्प के सामने जिनकी जुबान नहीं खुलती वे देश के भीतर दहाड़ने लगते हैं।

यह टकराव किसके हित में और किसके खिलाफ है

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‘यह युद्ध का नहीं बुद्ध का समय है’ कहने वालों ने बुद्ध पूर्णिमा (12 मई) के ठीक पांच दिन पहले भारत और पाकिस्तान को युद्ध के मैदान में पहुंचा दिया। और फिर दो-तीन दिन के हमल

पहलगाम आतंकी हमले से निकलने वाले सबक

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पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान जैसे युद्ध के मुहाने पर पहुंच गये हैं। संधियां निलम्बित की जा रही हैं और व्यापार से लेकर लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगाये जा

चट्टान में भी फूल खिल सकते हैं; शर्त खूने जिगर से सींचने की है

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यह एक ठोस हकीकत है कि दुनिया में कहीं भी मजदूर राज नहीं है। जहां कहीं कम्युनिस्ट नामधारी या मजदूर पार्टियां शासन में हैं भी, वहां भी मजदूर राज नहीं है। यह बात चीन, वियतना

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक दुनिया

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गौर से देखा जाये तो मानव ज्ञान के तीन अहम स्रोत रहे हैं। जिन्हें- ‘‘उत्पादन, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग’’- जैसे तीन क्षेत्रों में बांटा जाता रहा है। वास्तविक दुनिया में उत्पादन (यानी कृषि, उद्योग से लेकर वैज्ञानिक उपकरण) का विशाल क्षेत्र और मानव जाति के भरण-पोषण, रहन-सहन आदि को किन्हीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस रोबोटिक उपकरणों से प्रतिस्थापित करना शेखचिल्लीपना है। और फिर कोई तो होगा जो इन मशीनों का निर्माण व उपयोग करेगा। और जहां तक वर्ग संघर्ष के क्षेत्र की बात है वहां असल झगड़ा मनुष्यों के बीच है। एक ओर पूंजीपति है तो दूसरी ओर मजदूर, किसान और अन्य मेहनतकश हैं। साम्राज्यवादी देशों के आपसी झगड़े हैं तो ये देश तीसरी दुनिया के देशों का शोषण-दोहन करते हैं। यानी मनुष्यों की अति विशाल बहुसंख्या शोषित-उत्पीड़ि़त है। और रही बात विज्ञान और वैज्ञानिक प्रयोगों की तो ये आज एकाधिकारी पूंजी के सेवक बने हुए हैं।

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।