लोकलुभावनवाद : मुंह में राम बगल में छुरी
लोकलुभावनवाद (पापुलिज्म) ने इस वक्त भारत की राजनीति में ही नहीं बल्कि विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया हुआ है। और देखने में आ रहा है कि इसका प्रभाव और विस्तार इतना व्यापक हो गया है कि शायद
लोकलुभावनवाद (पापुलिज्म) ने इस वक्त भारत की राजनीति में ही नहीं बल्कि विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया हुआ है। और देखने में आ रहा है कि इसका प्रभाव और विस्तार इतना व्यापक हो गया है कि शायद
हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी साहब का व्यवहार देखिये। ट्रम्प के सामने ये ढेर हैं। वह इनकी ही नहीं हमारे देश के लोगों की सरेआम बेइज्जती करता है। हथकड़ियों में हमारे महान देश के लोगों को अमेरिका से भूखा-प्यासा संगीनों के साये में भेजता है। भारत के प्रधानमंत्री के मुंह में दही जम जाता है और हालिया चार दिनी युद्ध में अमेरिका हमें हमारी औकात बताता है। मोदी साहब के मुंह से अमेरिका के खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं फूटता है और अब ये महाशय देश में शान से फौजी ड्रेस में अपने पोस्टर लगवाते हैं। और अपना ऐसा स्वागत करवाते हैं मानो न जाने कौन सी जंग फतेह कर ली है। ट्रम्प के सामने जिनकी जुबान नहीं खुलती वे देश के भीतर दहाड़ने लगते हैं।
‘यह युद्ध का नहीं बुद्ध का समय है’ कहने वालों ने बुद्ध पूर्णिमा (12 मई) के ठीक पांच दिन पहले भारत और पाकिस्तान को युद्ध के मैदान में पहुंचा दिया। और फिर दो-तीन दिन के हमल
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान जैसे युद्ध के मुहाने पर पहुंच गये हैं। संधियां निलम्बित की जा रही हैं और व्यापार से लेकर लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगाये जा
यह एक ठोस हकीकत है कि दुनिया में कहीं भी मजदूर राज नहीं है। जहां कहीं कम्युनिस्ट नामधारी या मजदूर पार्टियां शासन में हैं भी, वहां भी मजदूर राज नहीं है। यह बात चीन, वियतना
गौर से देखा जाये तो मानव ज्ञान के तीन अहम स्रोत रहे हैं। जिन्हें- ‘‘उत्पादन, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग’’- जैसे तीन क्षेत्रों में बांटा जाता रहा है। वास्तविक दुनिया में उत्पादन (यानी कृषि, उद्योग से लेकर वैज्ञानिक उपकरण) का विशाल क्षेत्र और मानव जाति के भरण-पोषण, रहन-सहन आदि को किन्हीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस रोबोटिक उपकरणों से प्रतिस्थापित करना शेखचिल्लीपना है। और फिर कोई तो होगा जो इन मशीनों का निर्माण व उपयोग करेगा। और जहां तक वर्ग संघर्ष के क्षेत्र की बात है वहां असल झगड़ा मनुष्यों के बीच है। एक ओर पूंजीपति है तो दूसरी ओर मजदूर, किसान और अन्य मेहनतकश हैं। साम्राज्यवादी देशों के आपसी झगड़े हैं तो ये देश तीसरी दुनिया के देशों का शोषण-दोहन करते हैं। यानी मनुष्यों की अति विशाल बहुसंख्या शोषित-उत्पीड़ि़त है। और रही बात विज्ञान और वैज्ञानिक प्रयोगों की तो ये आज एकाधिकारी पूंजी के सेवक बने हुए हैं।
दुनिया में गाहे-बगाहे इस बात पर चर्चा चलती रहती है कि क्या भारत भविष्य में एक महाशक्ति (सुपर पावर) बन सकता है। क्या भारत चीन की तरह उभर सकता है। और अक्सर ही इसका जवाब ‘‘न
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह में जब दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने नाजी अभिवादन किया था तब ही यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अब ये नये नाज
काफी ना-नुकुर और षड्यंत्रकारी हील-हवाली के बाद इजरायल के नाजी जियनवादी क्रूर शासक, हमास के साथ ‘युद्ध विराम’ के लिए राजी हुए। और अंततः 19 जनवरी को युद्ध विराम समझौता लागू
‘एक देश-एक चुनाव’ हिन्दू फासीवादियों के अलावा इनके आका अडाणी-अम्बानी-टाटा जैसी एकाधिकारी घरानों की भी चाहत है। समय-समय पर होने वाले चुनाव इन्हें अपनी लूट में बाधा दिखाई देते हैं। अगर सरकार गिरती, बनती-बिगड़ती है तो इनका गणित गड़बड़ा जाता है। इन्हें नयी सौदेबाजियां करनी पड़ती हैं। जिस ‘‘विकास’’ का हवाला मोदी एण्ड कम्पनी तथा एकाधिकारी घरानों का पालतू मीडिया रात-दिन देता है। वह क्या है? वह भारत के प्राकृतिक संसाधनों की लूट के साथ भारत के मजदूरों-किसानों का निर्मम शोषण है।
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।